वो तेरह साँसें जो इश्क़ ने चुराई थीं

रात के ढाई बजे थे। बम्बई शहर ने अपनी आधी रात की चादर ओढ़ ली थी, जिसमें सिर्फ़ समंदर की दहाड़ और एसी की हल्की गुनगुनाहट गूँज रही थी। रुद्र की उँगलियाँ उस पुरानी, फ़टी हुई तस्वीर पर स्थिर थीं-एक चेहरा जो इतना जाना-पहचाना था कि उसकी रूह तक काँप उठी।

सामने की बालकनी से आरवी की आहट आई। वो बिना आवाज़ किए, ज़मीन पर बिछे शॉल को समेट रही थी। उसकी हर साँस, उसकी हर हरकत रुद्र को पता थी-एक पत्रकार के लिए यह खतरनाक ज्ञान था, एक आशिक़ के लिए यही ज़िंदगी थी।

“क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ शहद में लिपटी छुरी थी।

रुद्र ने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया। “वही, आरवी। जो तुम हर रोज़ मुझे देखने से रोकती हो।”

आरवी की परछाईं दरवाज़े पर आकर ठहरी। उस परछाईं में भी एक अजीब सा ग़ुरूर था, एक दर्द था। “रुद्र, ये अतीत है। इसे दफ़न होने दो।”

“दफ़न?” रुद्र हँसा, एक सूखी, बेजान हँसी। “मुझे क्या दफ़न होने दोगी? तुम्हारा सच, या मेरी अक़्ल?”

वो तस्वीर, जिस पर धुंधली स्याही से एक नाम लिखा था-‘विराज’-उनके बीच दीवार बनकर खड़ी थी। विराज, जो छः महीने पहले रहस्यमय तरीक़े से गायब हो गया था। विराज, जिसे ढूंढने का केस रुद्र के हाथ में था। और विराज, जो आरवी का मंगेतर था। या शायद कुछ और।

इश्क़ की शुरुआत हमेशा अँधेरे कमरे में जलती मोमबत्ती जैसी होती है-सुंदर, गर्म और हमेशा ख़तरे के साये में। रुद्र ने आरवी को तब देखा था जब वो विराज के गायब होने की रिपोर्टिंग कर रहा था। उसकी आँखों में समंदर का खारा पानी नहीं था, बल्कि रेगिस्तान की तपती हुई रेत थी, जहाँ हर दर्द जलकर राख हो चुका हो। उसी राख में रुद्र ने अपने दिल का बीज बो दिया था।

वो रात जब वो पहली बार एक दूसरे के क़रीब आए थे-बारिश की बूँदें खिड़की से टकरा रही थीं और उनके बीच की ख़ामोशी, लाखों शब्दों से भारी थी। रुद्र ने उस क्षण महसूस किया था कि वह अपनी पत्रकारिता की नैतिकता, अपनी सच्चाई की शपथ, सब कुछ एक पल में त्यागने को तैयार है-सिर्फ़ उस एक औरत के लिए जिसकी ख़ुशबू में कोई अनसुलझा राज़ छिपा था।

रुद्र ने धीरे से उस पल को याद किया, जब उसने आरवी को अपनी बाहों में भरा था। यह तब की बात है जब उसे विराज की डायरी मिली थी। डायरी के पन्नों में सिर्फ़ शक, जुनून और आख़िर में डर लिखा था। डर आरवी से।

आरवी सो रही थी। उसका सर उसके सीने पर था। उसकी साँसें नियमित थीं, गर्म थीं। रुद्र की अपनी साँसें तब तेज़ हो गई थीं। पत्रकार चिल्ला रहा था, ‘जाग! यह झूठ है! यह औरत तुम्हें धोखा दे रही है!’ पर दिल… दिल ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।

उस रात, उस ख़ामोशी में, रुद्र ने पहली बार खुद को गिना था।

उसने आरवी के माथे को चूमा। *पहली साँस*-यह तो बस प्यार है।

उसने डायरी के पन्नों की गंध महसूस की। *दूसरी साँस*-यह झूठ है।

उसने अपने सीने में आरवी की धड़कन सुनी। *तीसरी साँस*-क्या तुम हत्यारी हो?

उसके होंठ आरवी के बालों को छू रहे थे। *चौथी साँस*-मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता।

जब वो नौ साँसें पार कर चुका था, तो उसका शरीर दर्द से अकड़ गया था। यह सिर्फ़ साँसों का हिसाब नहीं था, यह उस पल का हिसाब था जब सत्य और प्रेम, दो तलवारों की तरह, उसकी छाती में घुस रहे थे।

*तेरहवीं साँस*-जब रुद्र ने अपनी आँखें बंद कर लीं और डायरी को तकिए के नीचे धकेल दिया। यही वो पल था जब उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चोरी को स्वीकार किया-यह **वो तेरह साँसें जो इश्क़ ने चुराई थीं**, वो साँसें जो उसे पत्रकार रुद्र से एक साधारण, कमज़ोर आशिक़ रुद्र में बदल चुकी थीं। उसने सत्य को दफ़न कर दिया था-उसकी आरवी के सीने की गर्मी के नीचे।

अब, बालकनी के दरवाज़े पर खड़ी आरवी ने अपने आँचल को कसकर पकड़ लिया। “तुम जानते हो, रुद्र। तुम सब जानते हो। बस ज़ुबान पर लाना नहीं चाहते।”

“मैं क्या जानता हूँ, आरवी?” रुद्र उठा, उसकी आवाज़ में लोहे की कठोरता थी, पर आँखों में पिघलती हुई मोमबत्ती का दर्द। “मैं जानता हूँ कि विराज एक जुआरी था। मैं जानता हूँ कि वो तुम्हें मारता था। मैं जानता हूँ कि तुम उससे छुटकारा चाहती थीं। मैं यह भी जानता हूँ कि जब वो मरा-या गायब हुआ-तुम मेरे साथ थीं।”

आरवी ने एक कदम आगे बढ़ाया। “मैं उस रात तुम्हारे पास आई थी, क्योंकि मुझे साँस नहीं आ रही थी, रुद्र! मुझे लगा था कि अगर मैं वहाँ एक और पल रुकी, तो मैं खुद को ख़त्म कर लूँगी। क्या तुम मुझसे पूछोगे, ‘तुमने क्या किया?’ या तुम बस मेरी साँसें गिनते रहोगे?”

उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, सिर्फ़ एक सूखी आग थी।

रुद्र ने अपनी जेब से एक छोटी सी सोने की चेन निकाली। “यह आज मिली, आरवी। विराज के फ़्लैट की छत पर, उस टूटी हुई टाइल के नीचे।”

आरवी की साँस अचानक रुक गई। रुद्र ने उसे देखा। वो एक साँस, जो रुक गई थी। उसकी धड़कन अनियमित हो गई थी।

“इस चेन में ‘R’ और ‘V’ गुदे हैं। तुमने मुझे बताया था कि विराज तुम्हें कभी कोई तोहफ़ा नहीं देता था, सिवाय दर्द के।” रुद्र ने चेन को अपनी हथेली पर रखा। “पर यह तो तुम ही हो, जिसने मुझे बताया था कि तुम किसी ‘राम’ नाम के शख़्स के लिए काम करती थी। कोई डीलर, कोई फाइनेंसर।”

आरवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह क्षण भर के लिए काँपी, जैसे उसके शरीर से आत्मा खींच ली गई हो।

“तुमने मुझसे कहा था, ‘वो तेरह साँसें जो इश्क़ ने चुराई थीं’, वो सिर्फ़ तुम्हारी नहीं थीं,” आरवी ने धीरे से फुसफुसाया। “वो मेरी भी थीं। जब विराज को पता चला कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ, उसने मुझे धमकी दी थी। उसने कहा था कि वो तुम्हारी ज़िंदगी तबाह कर देगा।”

रुद्र को महसूस हुआ जैसे ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो। यह कहानी तो उसने पहले सुनी थी-पीड़िता की कहानी। लेकिन पत्रकार का दिमाग़, जो इश्क़ में अंधा हो चुका था, अब धीरे-धीरे अपनी रौशनी वापस पा रहा था।

“क्या राम ने विराज को मार दिया?” रुद्र ने पूछा। यह सवाल इतना सीधा था, इतना क्रूर कि हवा भी थम गई।

आरवी ने अपनी आँखें खोलीं। उसमें अब कोई रहस्य नहीं था, बस समर्पण था। “विराज ख़ुद को मारना चाहता था, रुद्र। महीनों से। वह कर्ज़ में था। वह थक चुका था। पर उसने मरने से पहले एक खेल खेलना चाहा। उसने राम से एक डील की। एक बीमा पॉलिसी का पैसा, जो सिर्फ़ उसकी पत्नी को मिलता। और उसने मुझे बलि का बकरा बनाया।”

रुद्र को चक्कर आ गया। “तुम क्या कह रही हो?”

“विराज ने ख़ुद को मारा। पर उसने ये साज़िश रची कि मैं फँस जाऊँ। राम को पता था, पर राम मुझसे प्यार करता था-एक अलग तरह का प्यार। वफ़ादारी का प्यार। वो तुम्हारी नज़रों में मुझे बेगुनाह देखना चाहता था, इसलिए उसने सारे सुराग़ हटा दिए।”

रुद्र ने चेन को ज़ोर से मुट्ठी में भींच लिया। यह सोने की चेन राम की थी। राम ने इसे वहाँ छोड़ा था, ताकि रुद्र, पत्रकार, अपने आशिक़ के दिल पर जीत हासिल करे और सच्चाई सामने लाए।

“तो राम कहाँ है?” रुद्र का गला सूख गया था।

आरवी ने एक गहरी साँस ली, जो शायद उन तेरह साँसों से अलग थी जो इश्क़ ने चुराई थीं-यह आज़ादी की साँस थी।

“राम… राम ने अपनी वफ़ादारी का क़र्ज़ चुका दिया।” उसने रुमाल निकाला और अपनी आँखें पोंछी। “जब मैंने तुम्हें उस रात डायरी तकिए के नीचे रखते देखा, तो मैंने जान लिया कि तुम मुझे बचाने के लिए सच छुपा रहे हो। लेकिन राम जानता था कि जब तक तुम इस झूठ में रहोगे, तुम मुझसे ठीक से प्यार नहीं कर पाओगे। तुम्हारा पेशा तुम्हें खाता रहेगा।”

आरवी ने आगे बढ़कर रुद्र का हाथ पकड़ा। “राम ने कल रात ख़ुद को पुलिस के हवाले कर दिया। उसने कहा कि उसने ही विराज को मारा। तुम्हारे लिए, रुद्र। ताकि तुम आज़ाद हो जाओ।”

रुद्र के सीने में एक दर्द की लहर उठी। यह कैसा इश्क़ था? एक ऐसा इश्क़ जो इतना गहरा था कि न सिर्फ़ उसके लिए झूठ बोला गया, बल्कि किसी और ने ख़ुद को बलिदान कर दिया ताकि उसका प्रेमी, अपनी प्रेमिका को बिना अपराधबोध के प्यार कर सके।

“तुम आज़ाद हो,” आरवी ने फुसफुसाया।

रुद्र ने उसकी आँखों में देखा। अब उसे न तो विराज का भूत दिख रहा था, न ही किसी हत्या का सुराग़। उसे बस आरवी दिख रही थी-कमज़ोर, लेकिन सच्ची।

पर रुद्र जानता था, आज़ादी की कीमत बहुत महँगी थी।

उसने आरवी को कसकर गले लगाया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और गिनती शुरू की। एक… दो… तीन… वो तेरह साँसें वापस आ चुकी थीं। ये साँसें अब इश्क़ की चोरी नहीं थीं। ये गवाही थीं-एक ऐसे जटिल, भयानक और सुंदर प्रेम की गवाही, जिसने सत्य की बलि लेकर, दो लोगों की ज़िंदगी को बचा लिया था।

वो उस रात बालकनी में खड़े रहे, बम्बई की बारिश में भीगते हुए। रुद्र ने कभी उस केस की फ़ाइल पूरी नहीं की। राम को जो सज़ा मिली, वो एक प्रेम पत्र से कम नहीं थी-एक अजनबी का बलिदान, एक पत्रकार के इश्क़ के लिए।

और रुद्र? वह जानता था कि एक सच्चे आशिक़ को कभी भी अपने दिल से बड़ा सुराग़ नहीं मिल सकता।

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