
ख़ामोश हवस और राज़ की आहट- जब हनीमून का बिस्तर जंग का मैदान बन गया
समुद्र की लहरें उनके विला के दरवाज़े तक आकर लौट जाती थीं- एक सतत, धीमी धुन, जो प्यार में डूबे दो जिस्मों के लिए लोरी का काम करती थी। अदिति के लिए, यह गोवा नहीं था; यह स्वर्ग था। विक्रम- उसका पति, उसका देवता, उसका सबसे गहरा रहस्य। शादी को अभी एक हफ़्ता भी नहीं हुआ था, और उनका हनीमून एक ऐसी धधकती हुई आग जैसा था, जिसमें दुनिया की सारी सच्चाई, सारी चिंताएँ जलकर राख हो गई थीं। या शायद वह ऐसा मान रही थी।
कमरे में हल्की-सी नमकीन हवा भर गई थी, और मोमबत्तियों की मंद रोशनी में विक्रम की मज़बूत देह और भी ज़्यादा आकर्षक लग रही थी। अदिति ने अपने आप को पूरी तरह से उसके हवाले कर दिया था। वह उसे छूती थी, तो लगता था जैसे उसके हाथों में तपती हुई रेत है- जिसे वो कसकर पकड़ना चाहती थी, पर रेत फिसलती जा रही थी।
पिछली रात भी ऐसी ही थी- जुनून की इंतेहा। विक्रम का प्यार कभी कोमल नहीं होता था; वह एक तूफ़ान की तरह आता था, जो अदिति को बेख़ौफ़ अपनी गिरफ़्त में ले लेता था। वह जानती थी कि विक्रम में एक ख़ास तरह की तीव्रता है- एक ऐसी आग, जो न सिर्फ़ उसके होंठों पर, बल्कि उसकी आँखों की गहराई में भी दिखाई देती थी। लेकिन आज रात कुछ अलग था। आज उनकी नज़दीकी में एक अजीब सी जल्दबाज़ी थी, एक बेचैनी थी।
“विक्रम,” उसने फुसफुसाया, जब उसके हाथ उसकी कमर पर थे और उसके साँसों की गरमी अदिति की गर्दन पर पड़ रही थी। “क्या हुआ है? तुम आज इतने… तेज़ क्यों हो?”
विक्रम रुका नहीं। उसका स्पर्श अब भी वैसा ही जादुई था, पर अब उसमें प्यार से ज़्यादा कुछ और था- शायद विदाई। “कुछ नहीं, मेरी जान। मुझे बस तुम्हें महसूस करना है। आख़िरी तक।”
‘आख़िरी तक?’ यह शब्द अदिति के दिल में कसक बनकर चुभ गया। उसने कभी विक्रम से उसके अतीत के बारे में सवाल नहीं किए थे। विक्रम एक सफल इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट बिज़नेसमैन था, दुनिया घूमता था, और हमेशा एक ब्लैक अमेरिकन एक्सप्रेस कार्ड रखता था, जिस पर कोई लिमिट नहीं थी। वह महंगा था, रहस्यमय था, और इसी रहस्य ने अदिति को हमेशा उसकी ओर खींचा था। उसे लगा था कि उसका प्यार इस रहस्य के पर्दे को हमेशा के लिए उठा देगा।
रात गहरी थी। उनके शरीर एक-दूसरे में लिपट गए थे, और हवा में जुनून की महक थी। जब पल चरम पर था, विक्रम ने अचानक अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखें खाली नहीं थीं- उनमें एक शिकारी की सी सतर्कता थी। उसका हाथ तकिए के नीचे दबाए हुए उस बेवकूफ़ाना दिखने वाले ‘टूथब्रश बॉक्स’ पर चला गया, जिसे उसने हमेशा सफ़र में साथ रखा था। अदिति ने इस हरकत को अनदेखा कर दिया। उसने सोचा- शायद वह पानी पीना चाहता है।
टूटा हुआ पल और वो लोहे का स्पर्श
विक्रम हमेशा से ही कम सोता था। उसने आदतन सुबह चार बजे उठकर बालकनी पर सिगार जलाया। अदिति उसे देखती रही। उसकी पीठ नंगी थी, उस पर चंद्रमा की रोशनी पड़ रही थी। उसकी मांसल पीठ पर, कंधे के ठीक नीचे, एक पुराना-सा, गहरा-सा निशान था। अदिति ने इसे पहले भी देखा था, लेकिन विक्रम हमेशा टाल देता था, कहता था कि बचपन की कोई चोट है।
आज अदिति उस निशान तक पहुँची। उसने अपनी उँगलियों से धीरे-से उसे छुआ।
“यह झूठ है, विक्रम,” उसने बहुत धीरे से कहा। “यह कोई बचपन की चोट नहीं है। यह… किसी गोली का निशान लगता है।”
विक्रम ने सिगार फेंका। पल भर में, वह बालकनी से पलटकर बिस्तर के पास आ गया। उसकी आँखों में अब वह गर्मजोशी नहीं थी, जो कल रात तक थी। वहाँ अब केवल ख़ौफ़ और नियंत्रण का मिश्रण था।
“अदिति, तुम ज़्यादा मत सोचो।” उसकी आवाज़ कठोर थी।
- उसकी आवाज़ में अचानक वह खुरदुरापन आ गया था, जिसे अदिति ने पहले कभी नहीं सुना था।
- यह वह आवाज़ नहीं थी जो ‘आई लव यू’ कहती थी, यह वह आवाज़ थी जो ‘ऑर्डर’ देती थी।
“मैं ज़्यादा नहीं सोच रही,” अदिति उठकर बैठ गई। उसके शरीर पर सिर्फ़ चादर थी, पर वह अब शारीरिक रूप से नंगी नहीं महसूस कर रही थी- वह भावनात्मक रूप से नंगी हो चुकी थी। “तुम क्यों बार-बार दरवाज़े की तरफ़ देख रहे हो? तुम्हारा फ़ोन कल रात से लगातार साइलेंट पर क्यों बज रहा है, और तुमने उसे बाथरूम में क्यों छिपा रखा है? क्या तुम… क्या तुम मुझसे डर रहे हो, विक्रम?”
अदिति का सवाल हवा में तैर रहा था, और उसका जवाब बाहर से आया।
पड़ोस के जंगल से एक तेज़ आवाज़ आई। वह कार की आवाज़ नहीं थी- वह इंजन की आवाज़ भी नहीं थी। वह आवाज़ थी किसी के विला की बाउंड्री में ज़बरदस्ती घुसने की। टायर की रगड़ से कंक्रीट पर आई चिंगारी की आवाज़।
विक्रम का चेहरा तुरंत बदल गया। वह अपने बिस्तर से कूदकर उस ‘टूथब्रश बॉक्स’ की तरफ़ भागा। उसने तेज़ी से बॉक्स खोला। अदिति की साँसें रुक गईं। बॉक्स के अंदर टूथब्रश नहीं था।
वहाँ था- एक बेरेटा 92एफएस पिस्तौल, जिस पर काले रंग का साइलेंसर लगा हुआ था।
राज़ का पर्दाफाश- ‘किडनैपिंग’ की साज़िश
अदिति के गले से एक पतली-सी चीख़ निकली। वह चीख़ हवा में ही घुट गई, क्योंकि विक्रम ने तेज़ी से उसके मुँह पर हाथ रख दिया।
- “एक शब्द नहीं, अदिति। अगर तुम ज़िंदा रहना चाहती हो, तो एक शब्द नहीं।”
- उसकी आँखें आग उगल रही थीं- यह वह विक्रम नहीं था, जिससे उसने शादी की थी। यह कोई मशीन थी, जो अब एक्शन मोड में आ चुकी थी।
“ये… ये क्या है?” अदिति ने लड़खड़ाती हुई आवाज़ में पूछा।
“यह मेरी ज़िंदगी है,” विक्रम ने पिस्तौल लोड करते हुए कहा। उसकी उँगलियाँ इतनी स्थिर थीं, जैसे वह रोज़मर्रा का काम कर रहा हो। “और अब, तुम्हारी भी।”
तभी, बाहर से एक भारी, खुरदुरी आवाज़ आई, जो बियर पीने वाले किसी मोटे आदमी की लग रही थी। आवाज़ हिंदी में थी, पर लहजा विदेशी था।
“विक्रम! हमें पता है तुम अंदर हो। दरवाज़ा खोलो और खेल ख़त्म करो। तुम्हारी बीवी हमारे लिए एक अच्छा इनाम होगी।”
अदिति का दिमाग़ घूम गया। किडनैपिंग। अभी? उनके हनीमून पर? ये लोग कौन थे? और वे विक्रम का नाम क्यों ले रहे थे?
विक्रम ने अपना बटुआ निकाला। उसने उसमें से एक छोटा, धातु का सिक्का बाहर फेंका, जो फर्श पर घूमता रहा।
“तुम कौन हो, विक्रम?” अदिति ने अब डर को त्याग कर धोखे का सामना करने का फ़ैसला किया। “तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला? तुम्हारी सच्चाई क्या है?”
विक्रम ने झटके से कपड़े पहने। ब्लैक टी-शर्ट और टैक्टिकल ट्राउज़र्स। वह अब पूरी तरह से एक सैनिक लग रहा था। उसने अपने गले से एक पतली-सी चेन निकाली, जिस पर एक छोटा-सा पेंडेंट था। वह पेंडेंट एक साधारण डिज़ाइन नहीं था- वह एक सरकारी सील थी।
“मेरा नाम विक्रम नहीं है, अदिति। मेरा नाम… कुछ और था। मैं तीन साल पहले तुम्हें मिला, जब मैं रिटायर होने की कोशिश कर रहा था।”
“रिटायर? कहाँ से? बिज़नेस से?”
विक्रम ने कड़वाहट से हँसा। “मैं सरकार के लिए काम करता था। एक गुप्त ऑपरेशनल इकाई के लिए। और जिस ‘इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट’ बिज़नेस की तुमने बात की, वह सिर्फ़ कवर था। मैंने एक बहुत बड़ी साज़िश का पर्दाफ़ाश किया था, और मैंने अपनी टीम को धोखा दिया था। या शायद मैंने सच के लिए अपनी टीम को धोखा दिया था। यह विवाद का विषय है।”
अदिति के होंठ थरथरा रहे थे। उसे याद आया- विक्रम कभी भी अपनी कोई फ़ोटो नहीं खिंचवाता था। उसके सोशल मीडिया अकाउंट न के बराबर थे। वह हमेशा कैश में डील करता था। ये सब… एक बिज़नेसमैन की नहीं, एक भगोड़े की आदतें थीं।
“मैंने प्यार किया था, विक्रम,” अदिति के गालों पर आँसू बहने लगे। “मैंने एक आदमी से प्यार किया था। क्या वह आदमी कभी सच था?”
विक्रम उसके पास आया। इस बार उसका स्पर्श वैसा नहीं था, जैसा हनीमून पर होता है। यह एक कमांडो का स्पर्श था, जिसने अपनी प्रियतमा को ढाल बनाने के बजाय, सुरक्षित रखने का फ़ैसला किया हो।
- “हाँ, वह सच था। मेरा प्यार तुम्हारे लिए हमेशा सच था। यही मेरी कमज़ोरी थी। यही कारण है कि वे यहाँ हैं।”
- उसने एक ब्रीफ़केस खोला, जिसमें एक और पिस्तौल और कई मैगज़ीनें थीं।
“वे तुम्हें किडनैप करने आए हैं ताकि वे मुझ तक पहुँच सकें। उन्हें लगता है कि तुम मेरी Achilles Heel हो।”
रणनीति और विश्वासघात की अग्निपरीक्षा
दरवाज़ा तेज़ी से खटखटाया गया। अब ज़ोर-ज़ोर से गाली-गलौज की आवाज़ें आने लगीं। उनकी आवाज़ों में क्रूरता थी, जो अदिति को अंदर तक डरा रही थी।
विक्रम ने अदिति को ज़मीन पर खींचा। “सुनो, विला के पीछे एक गुप्त रास्ता है। मैं उन्हें उलझाता हूँ। तुम्हें भागना होगा।”
“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी!” अदिति ने ज़िद की। उसका डर अब गुस्से में बदल रहा था- पति के धोखे का गुस्सा, और अपनी मासूमियत के टूटने का ग़म।
“तुम्हें जाना होगा, अदिति! यह मेरा आदेश है!” विक्रम की आवाज़ गरज उठी।
ठीक इसी पल, दरवाज़ा टूट गया। लकड़ी के टुकड़े कमरे में बिखरे। तीन साए अंदर घुसे- काले कपड़े पहने, भारी-भरकम, और हाथ में ऑटोमैटिक राइफ़ल लिए हुए।
कमरे में मोमबत्ती बुझ चुकी थी, और एकमात्र रोशनी समुद्र तट से आ रही थी, जो उन तीनों के चेहरे पर एक डरावनी चमक दे रही थी।
“विक्रम,” उनमें से एक ने फुसफुसाया। “तुमने सोचा कि तुम भाग सकते हो? और यह छोटी लड़की कौन है? तुम्हारी नई ख़ासियत? हमें लगा तुम औरतों पर भरोसा नहीं करते।”
किडनैपरों की निगाह अदिति पर थी। वह नग्नता में लिपटी हुई, भयभीत अवस्था में थी। इस अंतरंगता के ठीक बाद यह हिंसा, अदिति के लिए दिल दहला देने वाला अनुभव था। उसका हनीमून, उसका प्यार, उसका नया जीवन- सब कुछ इस पल टूटकर बिखर गया था।
विक्रम ने अदिति को पीछे धकेला। उसने पिस्तौल उठाई और तुरंत दो फायर किए। साइलेंसर के कारण आवाज़ दबी रही, पर लक्ष्य अचूक था। पहला आदमी अपनी राइफ़ल गिराकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
“भागो, अदिति!”
लेकिन अदिति जड़ हो चुकी थी। उसके सामने उसका पति नहीं था- उसके सामने एक हाई-ट्रेन्ड किलर था, जो अब उसके जीवन को बचाने के लिए लड़ रहा था। उसने अपने पति को झूठ और लहू की नदी में तैरते हुए देखा।
जब दूसरा आदमी विक्रम पर वार करने आगे बढ़ा, तो अदिति ने वह किया, जिसकी उम्मीद न विक्रम को थी, न ही उन हमलावरों को।
वह पीछे नहीं भागी।
उसने ज़मीन पर पड़ी हुई, टूटी हुई दरवाज़े की कुंडी उठाई। जैसे ही दूसरा हमलावर विक्रम पर झपटा, अदिति ने अपनी पूरी ताक़त से उसके सिर के पीछे वार किया।
विक्रम ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में अब आश्चर्य नहीं था, बल्कि एक अजीब-सी प्रशंसा थी। उसकी पत्नी, जिसकी मासूमियत पर उसने पर्दा डालने की कोशिश की थी, अब उसकी जंग में शामिल हो चुकी थी।
“तुम… तुम क्या कर रही हो?” विक्रम ने कहा।
“अगर तुम झूठे थे, विक्रम,” अदिति ने आँसू पोंछते हुए कहा। उसकी आवाज़ में लोहे-सी दृढ़ता थी। “तो मेरा प्यार झूठ नहीं है। मैं शायद तुम्हें नहीं जानती, पर मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी। अब बताओ- मेरी मदद कैसे करूँगी?”
अदिति का राज़ खुल चुका था। वह सिर्फ़ एक प्रेमिका नहीं थी- वह एक लड़ाका भी थी। पति का राज़ हनीमून पर किडनैपिंग से ठीक पहले खुला, लेकिन इस धोखे ने उनके बंधन को कमज़ोर नहीं किया, बल्कि उसे एक नई, ख़तरनाक सच्चाई पर मज़बूत कर दिया।
बाहर तीसरा आदमी चीख़ रहा था। विक्रम ने पिस्तौल लोड की।
- “विला के नीचे एक बेसमेंट है। वहाँ एक बंकर है। जल्दी से वहाँ जाओ। मैं आख़िरी आदमी को संभालता हूँ।”
- “और फिर?” अदिति ने पूछा।
- “और फिर,” विक्रम ने एक घातक मुस्कान दी, “मैं तुम्हें एक ऐसा हनीमून दूँगा, जिसके बारे में तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा। जहाँ हम भागेंगे, एक-दूसरे को फिर से जानेंगे, और जहाँ मेरा हर राज़ हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाएगा।”
अदिति ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने न तो उस धोखे का मातम मनाया, न ही टूटे हुए सपनों का। अब सिर्फ़ ज़िंदा रहने की जंग थी, और अपने पति की उस काली दुनिया में अपने लिए जगह बनाने की ज़िद थी। उसने तेज़ी से बेसमेंट की सीढ़ियों की तरफ़ दौड़ लगाई, और पीछे विक्रम और बचे हुए अपराधी के बीच लड़ाई की आवाज़ें गूँज रही थीं। उनका हनीमून ख़त्म हो चुका था। अब, उनकी असली ज़िंदगी शुरू हो रही थी। एक रोमांचक, ख़तरनाक, और लहू से सनी हुई प्रेम कहानी।








