गोवा का आतंक: दिन के उजाले में मंडराता साया
मेरा नाम आरव है। लोग मुझे लेखक कहते हैं- डरावनी कहानियों का लेखक। लेकिन मैं खुद को सिर्फ़ एक खोजकर्ता मानता हूँ। मैं अँधेरे में भूत नहीं खोजता, मैं इंसानी डर की तह तक जाता हूँ। सदियों से एक मिथक रहा है कि आत्माएँ सिर्फ रात के परदे में बाहर आती हैं। रात- उनके छिपने की जगह, उनके आतंक का मंच। लेकिन जब मुझे गोवा से जुड़ी वो खबर मिली, तो मेरे भीतर का तार्किक ढाँचा हिल गया।
दिन का डर। सूर्य की कठोर रोशनी में लिपटा हुआ आतंक। यह विचार ही मेरी रीढ़ में ठंडी लहर दौड़ा गया। गोवा- जिसे दुनिया रेत, फेनी और खुशियों का शहर मानती है- उसके भीतरी कोने, पुर्तगाली खंडहरों और खामोश सड़कों पर, साया दिन के 12 बजे भी आपका इंतजार कर रहा है। यह मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं, यह डरावने ब्रह्मांड का एक नया नियम था, जिसे मुझे तोड़ना या स्वीकार करना था।
मैंने तुरंत अपनी यात्रा की तैयारी की। सामान्य पर्यटक उत्तरी या दक्षिणी गोवा जाते हैं। मैं वहाँ गया जहाँ नक्शे खत्म हो जाते हैं, जहाँ सड़कों के किनारे बेनाम कब्रें बनी हैं, और जहाँ हवा में नमी के बजाय सदियों पुराना इंतज़ार घुला है।
खंडहर और सन्नाटे का Phone Booth
पहला ठिकाना एक पुराना, जीर्ण-शीर्ण पुर्तगाली चर्च था। नाम मैं यहाँ नहीं लूँगा, क्योंकि नाम लेने से साया उस जगह से पीछा करके आपके साथ आ जाता है। यह चर्च 400 साल पुराना था, जिसके चारों ओर अब सिर्फ़ सूखी घास और जल चुके पेड़ थे। बाहरी दीवारें काई से ढकी थीं, और दोपहर की तेज़ धूप में भी वहाँ एक अजीब-सी नमी महसूस हो रही थी।
गाइड, एक बूढ़ा स्थानीय व्यक्ति जिसका नाम फेलिक्स था, पहले तो आने को तैयार नहीं हुआ। उसकी आँखें डरी हुई थीं, वह बार-बार क्रॉस का निशान बना रहा था। “साहब,” उसने कोंकणी और टूटी हिंदी के मिश्रण में कहा, “रात का डर तो फिर भी अँधेरे में छिप जाता है। यहाँ दिन में आना, यानी उन्हें न्योता देना है कि वे आपको देख लें। वे धूप से नहीं डरते।”
मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी। तर्क और सच्चाई मेरे हथियार थे। मैं कैमरा और EMF मीटर लेकर चर्च के परिसर में घुसा। बाहर 35 डिग्री सेल्सियस तापमान था, लेकिन जैसे ही मैंने मुख्य दरवाजे की दहलीज पार की, मेरे चेहरे पर एक बर्फीली ठिठुरन महसूस हुई।
चर्च के मुख्य हॉल में सब कुछ टूटा हुआ था। छत ढह चुकी थी, जिससे सूरज की किरणें सीधे धूल भरे फर्श पर पड़ रही थीं। लेकिन जहाँ किरणें पड़ती थीं, वहाँ भी प्रकाश नहीं था। यह अजीब था- दृश्यता पूर्ण थी, लेकिन वातावरण बोझिल और काला महसूस हो रहा था।
मेरा ध्यान हॉल के एक कोने में गया। वहाँ एक छोटा, लोहे का ढाँचा था। जंग खाया हुआ, टूटी हुई खिड़कियों वाला, जो शायद सदियों पहले कम्युनिकेशन या सुरक्षा के लिए बनाया गया होगा। यह कोई आधुनिक फोन बूथ नहीं था, लेकिन स्थानीय लोग इसे ही ‘Phone Booth’ कहते थे- एक ऐसी जगह जहाँ आप खड़े होकर किसी अदृश्य दुनिया से संपर्क साध सकते हैं। एक ऐसा केंद्र जहाँ आवाजें भटकती हैं।
मैंने अपना रिकॉर्डर ऑन किया। सन्नाटा इतना गहरा था कि कानों में दर्द होने लगा। ऐसा लगा जैसे हवा को किसी अदृश्य शक्ति ने सोख लिया हो।
ईएमएफ मीटर शांत था। मेरी साँस अटकी हुई थी। मैं खुद को दिलासा दे रहा था कि यह सब सिर्फ़ मेरा दिमाग है। तभी, फर्श पर पड़ी धूल में, मुझे एक आहट सुनाई दी। बहुत धीमी- जैसे कोई नंगे पैर, भारी शरीर को घसीटता हुआ चल रहा हो। यह आहट उस कोने से आ रही थी जहाँ लोहे का ‘Phone Booth’ खड़ा था।
मैंने टॉर्च ऑन की, हालाँकि धूप पर्याप्त थी। मैंने उस कोने की तरफ़ कदम बढ़ाए।
जैसे ही मैं बूथ के पास पहुँचा, तापमान अचानक इतना गिरा कि मेरे हाथ की नसें जमने लगीं। मुझे लगा जैसे मैं किसी गहरे फ्रिज के अंदर खड़ा हूँ। और फिर, मैंने उसे देखा।
बूथ के भीतर- सीधे सूर्य की किरण के नीचे- वहाँ कुछ नहीं था। कोई छाया नहीं, कोई व्यक्ति नहीं। लेकिन मुझे स्पष्ट रूप से लगा जैसे बूथ के अंदर कोई बैठा है। या खड़ा है। वह एक धुंधला, कंपन करता हुआ वायुमंडलीय दबाव था। मेरे वैज्ञानिक तर्क इसे गैस, ऑप्टिकल इल्यूज़न, या धूल कह सकते थे। लेकिन मेरे भीतर का इंसान जानता था कि यह एक साया है।
मैंने हिम्मत करके रिकॉर्डर बूथ के दरवाजे के पास रखा।
“कौन हो तुम?” मैंने धीमी, काँपती आवाज में पूछा।
कोई जवाब नहीं आया। बस ईएमएफ मीटर चिल्लाने लगा- 8.0, 9.0, 10.0! यह मीटर कभी 2.0 से ऊपर नहीं गया था! मेरी धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा वह मीटर की रीडिंग को प्रभावित कर रही होगी।
फिर, उस लोहे के ढांचे से एक आवाज आई। यह कोई चीख नहीं थी, कोई फुसफुसाहट नहीं। यह ऐसी आवाज थी, जैसे कोई बहुत दूर से, पानी के नीचे से, ज़ोर से साँस ले रहा हो।
– यह साँस नहीं थी। यह इंतज़ार था। वर्षों-सदियों का इंतज़ार।
मैं पीछे हट गया। उस पल, मुझे एहसास हुआ कि डर सिर्फ़ अँधेरे से नहीं आता। डर तब आता है जब आप जानते हैं कि आपके और उस सत्ता के बीच कोई बाधा नहीं है- न रात का परदा, न दिन का उजाला।
गोवा की विख्यात-अपख्यात सड़क
फेलिक्स मुझे अगले ठिकाने पर ले जाने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन पैसों और मेरे जुनून ने उसे मजबूर कर दिया। हमारा अगला गंतव्य था गोवा की एक हाईवे सड़क, जिसे स्थानीय लोग ‘भूतीया बाईपास’ कहते थे। यह सड़क खासकर दोपहर के समय दुर्घटनाओं के लिए कुख्यात थी। लोग कहते थे कि दोपहर की प्रचंड गर्मी में, जब डामर पिघलने लगता है, तो सड़क के किनारे एक महिला खड़ी दिखती है, जो लिफ्ट माँगती है। अगर आप रुक गए, तो वह आपकी आखिरी यात्रा होगी।
सूरज हमारे सिर के ठीक ऊपर था। हवा में गर्मी इतनी थी कि शरीर झुलस रहा था। मैं अपनी कार चला रहा था, और फेलिक्स पीछे सीट पर आँखें बंद करके मंत्र बुदबुदा रहा था।
जैसे ही हम बाईपास पर मुड़े, मुझे लगा कि कार की गति अचानक धीमी हो गई है। मैंने एक्सिलरेटर पर पैर दबाया, लेकिन गाड़ी भारी लगने लगी- जैसे किसी ने पीछे से कार को कसकर पकड़ लिया हो।
सड़क दोनों ओर से घने जंगलों से घिरी थी। दूर-दूर तक कोई और गाड़ी नहीं थी। यह सन्नाटा दोपहर के शोर में डूबा हुआ था- चिड़ियों की आवाज़ें, दूर से आती लहरों की गूँज। लेकिन इस सबके बावजूद, मेरे कान एक अलग तरह के ‘सन्नाटे’ को पकड़ रहे थे- वह जो मौत से पहले आता है।
मैंने फेलिक्स को देखा। वह पसीने से तर था, लेकिन आँखें कसकर बंद थीं।
मैंने ओआरवीएम में झाँका।
और फिर, मैंने उसे देखा।
ठीक सड़क के किनारे, एक पतली, सफेद साड़ी में लिपटी आकृति खड़ी थी। वह हमें पीठ दिखा रही थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, और वह स्थिर थी- इतनी स्थिर कि धूप में भी उसकी परछाईं हिल नहीं रही थी।
मेरा दिल मेरे सीने में उछल पड़ा। यह ठीक वैसा ही दृश्य था जैसा कहानियों में होता है। लेकिन यह कहानी नहीं थी। यह दिन का उजाला था, और वह वहाँ खड़ी थी।
“देखना नहीं, साहब! बस चलते रहो!” फेलिक्स ने लगभग चीखते हुए कहा, जैसे उसे मेरे विचारों का पता चल गया हो।
लेकिन मैं एक लेखक था। एक खोजकर्ता। मैं बिना देखे कैसे निकल जाता?
मैंने कार को और धीमा किया। मेरी आँखों ने उस आकृति को स्कैन किया। उसका रूप, उसकी साड़ी, सब कुछ सामान्य था। अगर मैं किसी सामान्य जगह पर होता, तो मैं उसे बस एक परेशान महिला समझता। लेकिन मैं गोवा के उस बदनाम बाईपास पर था, और धूप उसकी उपस्थिति की गवाही दे रही थी।
जैसे ही हमारी कार उसके करीब पहुँची, उसने अचानक मुड़कर देखा।
उसकी आँखें- अगर आँखें थीं तो- वे सिर्फ़ दो गहरे, काले गड्ढे थे। उनमें कोई श्वेत पटल नहीं था, कोई पुतली नहीं थी। वे अंधेरे के स्रोत थे, जो दिन के उजाले को सोख रहे थे।
और फिर उसने अपना हाथ उठाया। लिफ्ट माँगने के लिए नहीं। इशारा करने के लिए नहीं। उसने बस अपना हाथ, बहुत धीरे से, कार की तरफ़ बढ़ाया।
वह छू नहीं रही थी, लेकिन मुझे लगा कि कार का शीशा पिघल रहा है। मेरे चेहरे पर गर्मी की लहर महसूस हुई, जो बाहर की गर्मी से बिल्कुल अलग थी- यह आग की गर्मी थी।
ठीक उसी पल, मेरी कार की हेडलाइट्स- जो दिन में ऑफ थीं- खुद-ब-खुद जल उठीं। फ्लैश-फ्लैश-फ्लैश। जैसे कोई मशीनरी पागल हो गई हो। और कार के अंदर, एक भयानक, सड़ी हुई मांस की गंध फैल गई।
मैंने बिना सोचे समझे, एक्सिलरेटर को पूरा दबा दिया। टायर ज़ोर से चीखे, और गाड़ी आगे भागी। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मुझे डर था कि अगर मैंने मुड़कर देखा, तो वह महिला अब सड़क पर नहीं, बल्कि पिछली सीट पर फेलिक्स के बगल में बैठी होगी।
सूर्य का धोखा
हम उस बाईपास से बहुत दूर निकल चुके थे। मैंने एक छोटे से गाँव के ढाबे पर गाड़ी रोकी। मैं हाँफ रहा था। फेलिक्स रो रहा था, “हम मर गए, साहब। हम मर गए। वह Phone Booth नहीं था, वह मौत का कनेक्शन था। और वह सड़क, वह इंतज़ार करती है।”
मैं शांत होकर बैठ गया। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में अँधेरे का सामना किया था। अँधेरा आरामदायक होता है- आप जानते हैं कि खतरा कहाँ है। लेकिन यहाँ गोवा में, धूप में खड़े होकर मुझे एहसास हुआ कि डर का असली स्वरूप क्या है।
डर वह नहीं जो अंधेरे में छिपता है। डर वह है जो खुलेआम खड़ा होता है, जिसे आप स्पष्ट रूप से देखते हैं, लेकिन जिसके अस्तित्व को विज्ञान समझा नहीं सकता।
मैंने चर्च के कोने में उस साये को देखा था, जो धूप को भी काला कर रहा था। मैंने बाईपास पर उस महिला को देखा था, जिसकी आँखें उजाले को निगल रही थीं। ये आत्माएँ सिर्फ़ गोवा के पर्यटन स्थलों के मिथक नहीं थे। ये ऐसी सत्ताएँ थीं जो इतनी शक्तिशाली थीं कि उन्हें रात के सुरक्षा जाल की ज़रूरत नहीं थी। वे अपनी महफ़िल दिन के उजाले में जमाती थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि इंसान दिन में सबसे ज़्यादा तर्कशील होता है- और इसीलिए, सबसे ज़्यादा कमज़ोर भी।
मेरा पूरा रिसर्च पेपर, मेरी पूरी वैज्ञानिक सोच, उस जलती हुई दोपहर में राख हो गई। गोवा में आतंक का कोई समय नहीं है। कोई भी पल, कोई भी कोना, चाहे उस पर सूर्य का प्रकाश कितना भी क्यों न पड़ रहा हो- वह Phone Booth बन सकता है। एक ऐसा Phone Booth, जहाँ कॉल कभी खत्म नहीं होता, और जहाँ दूसरी तरफ़ से आने वाली आवाजें सिर्फ़ आपका नाम पुकारती हैं- हमेशा के लिए।
मैं गोवा छोड़कर वापस आ गया। मेरी डायरी में अब एक ही तथ्य लिखा है, जिसे मैं कभी झुठला नहीं सकता: ‘गोवा में भूत महफ़िल जमाते हैं। और वे आपको देखना पसंद करते हैं, जब आपकी आँखें पूरी तरह खुली हों।’
और जब भी दोपहर की तेज़ धूप मेरे चेहरे पर पड़ती है, तो मुझे महसूस होता है- कहीं किसी कोने में, कोई साया मुझे देख रहा है। इंतजार कर रहा है। वह जानता है कि मेरे डर को अब अँधेरे की ज़रूरत नहीं है।








