साजिश-ए-जुनूँ: हसीन दिलरुबा और ख़ून का इकरार

रात के ढाई बज रहे थे। मुंबई की गगनचुंबी इमारत के पैंटहाउस की खिड़की से नीचे देखने पर शहर सिर्फ़ जगमगाता हुआ स्याह समुंदर लगता था। मेरे सीने पर अहाना का सिर रखा था। उसकी साँसें धीमी, लयबद्ध थीं, जैसे रात की चुप्पी को थामे हुए कोई संगीत। इस पल में, वह मेरी थी। पूरी तरह से। उसके जिस्म की ख़ुशबू मेरे रूह में उतर चुकी थी, नशीली और घातक। पर मुझे मालूम था, यह शांति एक भ्रम है। अहाना कोई खुली किताब नहीं थी; वह एक बंद दरवाज़ा थी जिसके पीछे मर्डर मिस्ट्री और एक हसीन दिलरुबा का जुनून छिपा था।

मेरा नाम वीर है। लोग मुझे सफल, शांत और बेहद व्यावहारिक मानते हैं। लेकिन जब से अहाना मेरी ज़िंदगी में आई, मेरे भीतर का सारा व्यावहारिकता पिघलकर एक ख़तरनाक जुनून बन गया। मैंने उसे पहली बार एक आर्ट गैलरी में देखा था। वह संगमरमर की मूर्ति नहीं, साक्षात् देवी लग रही थी, जिसे किसी ने दर्द और सौंदर्य की स्याही से तराशा हो। उसकी आँखों में एक ऐसी उदासी थी जो तुरंत मेरे हृदय को छू गई थी-एक ऐसी चोट जिसे केवल मेरा प्यार ही भर सकता था, ऐसा मैंने उस वक़्त सोचा था।

और फिर हमारे बीच वह आग लगी। वह आग जो मुझे जलाती थी, पिघलाती थी और दोबारा गढ़ती थी।

रूहानी कशिश और इकरार-ए-जिस्म

अहाना और मेरा रिश्ता शब्दों का मोहताज़ कभी नहीं रहा। यह सीधे रूह से शुरू हुआ और जिस्म पर आकर ठहरा। वह पहली रात आज भी मुझे शिद्दत से याद है। बारिश की बूँदें खिड़की पर तेज़ धुन बजा रही थीं। मैंने उसके चेहरे पर बिखरे काले घने बाल हटाए। वह इतनी नाज़ुक थी कि छूने से टूट जाए।

“अहाना, तुम क्या छिपा रही हो?” मैंने फुसफुसाते हुए पूछा था।

उसने धीरे से अपनी पलकें उठाईं। उसकी आँखों में गहरा डर था, पर उस डर के पीछे छिपी एक प्रचंड आग थी। “वीर, तुम मुझे बचाओगे?”

“दुनिया की हर शै से, हर ख़तरे से,” मेरा जवाब मेरी आत्मा की गहराई से निकला। यह सिर्फ़ वादा नहीं, मेरा इकरार था।

उसने मेरे कॉलर को भींचा और एक पल में ही सारी दूरी मिटा दी। वह चुंबन, वह स्पर्श… वह सिर्फ़ कामुकता नहीं थी। वह आत्म-समर्पण था। अहाना अपने डर, अपने रहस्य, अपनी पूरी पहचान को मुझमें घोल देना चाहती थी। जब उसके कपड़े ज़मीन पर गिरे, तो उसकी त्वचा बर्फ़-सी ठंडी थी, लेकिन जहाँ भी मेरा स्पर्श पड़ा, वहाँ ज्वालामुखी फूट पड़ा। उसके शरीर की बनावट, उसकी कमर की नज़ाकत, उसकी साँसों की तेज़ होती रफ़्तार… सब मेरे वश में था। वह हर स्पर्श पर दर्द और आनंद के बीच झूलती थी।

हमने उस रात प्रेम नहीं किया, हमने एक दूसरे को जिया। हमने अपने जुनून की लपटों में अपने अस्तित्व को जलाया। अहाना की आहें, मेरी गर्जनाएँ, और खिड़की पर बरसता पानी… एक सिम्फनी रच रहे थे जो केवल हम सुन सकते थे। जब सब शांत हुआ, तो मैंने देखा कि उसके बाएँ कंधे पर एक छोटा, पुराना ज़ख़्म का निशान था। मैंने पूछा तो उसने कहा, “बचपन की चोट है,” और अपनी आँखें बंद कर लीं। उस वक़्त मुझे लगा कि वह थक गई है, पर अब जानता हूँ, वह झूठ बोलने के बाद की थकान थी।

रहस्य की दस्तक और रात का ख़ामोश गवाह

हमारा प्रेम ऐसा ही चलता रहा-दिन के उजाले में परफ़ेक्ट कपल, और रात के अँधेरे में दो आत्माएँ जो किसी अनजाने ख़तरे के साए में पल रही थीं। अहाना कभी भी फ़ोन को अपनी पहुँच से दूर नहीं रखती थी, और दरवाज़े की घंटी बजते ही उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगता था।

एक हफ़्ते बाद। मुंबई में लगातार तीन दिनों से राघव नाम के एक बड़े बिल्डर के लापता होने की ख़बरें सुर्ख़ियाँ बटोर रही थीं। राघव, जिसे कई लोग बाहुबली मानते थे, उसका ग़ायब होना एक राष्ट्रीय सनसनी बन चुका था। अहाना इन ख़बरों को ख़ास दिलचस्पी से देखती थी, पर मेरे पूछने पर हमेशा विषय बदल देती।

उस रात, अहाना बाथरूम में शॉवर ले रही थी। मुझे अचानक महसूस हुआ कि मुझे उसके हैंडबैग में देखना चाहिए। यह मेरे स्वभाव के ख़िलाफ़ था, पर मेरे अंदर का जासूस अब जाग चुका था। बैग में कुछ ख़ास नहीं था-लिपस्टिक, क्रेडिट कार्ड, एक छोटा पर्स। पर पर्स के नीचे, एक अजीब सी चाबी दबी थी। यह किसी लॉकर या तिजोरी की चाबी नहीं लग रही थी, बल्कि पुराने स्टाइल के किसी भारी बक्से की चाबी थी।

मैं उस चाबी को हाथ में लेकर खड़ा था जब बाथरूम का दरवाज़ा खुला। अहाना बाहर आई। उसकी आँखें लाल थीं, शायद गरम पानी से। वह मेरे हाथों में चाबी देखकर ठिठक गई। एक पल के लिए उसकी साँस रुक गई। उस एक सेकंड की ख़ामोशी में, मैंने रहस्य की पूरी कहानी पढ़ ली।

“यह क्या है, अहाना?” मैंने आवाज़ में यथासंभव शांति रखी।

वह धीरे-धीरे मेरे पास आई। उसके जिस्म से नहाए हुए लैवेंडर की ख़ुशबू आ रही थी, पर मेरे लिए वह गंध अब संदेह की थी। उसने मेरे हाथ से चाबी ली और उसे कसकर मुट्ठी में भींच लिया।

“यह मेरे माँ की पुरानी पेटी की चाबी है,” उसने बड़ी सफ़ाई से कहा। “बचपन की कुछ यादें हैं, बस।”

लेकिन उसकी आँखों ने झूठ बोला। उसका दायाँ हाथ हल्का सा काँप रहा था।

मैंने उसे अपनी बाहों में लिया। इस बार स्पर्श में जुनून कम, जाँच ज़्यादा थी। “तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो, मेरी जान। और तुम जानती हो कि तुम्हारा सच कितना भी काला क्यों न हो, यह हमारे बीच नहीं आ सकता।”

वह मेरे सीने से लगकर रोने लगी। वह रोना सच्चा था, लेकिन उस रोने के पीछे छिपी शातिर चाल को समझना अभी बाक़ी था।

अंधेरे का राज़ और ख़ूनी खेल

अगले दिन, पुलिस ने राघव की हत्या की पुष्टि कर दी। यह हत्या क्रूर थी-उसे चाकू से गोदकर मारा गया था और लाश को एक सूटकेस में बंद करके समुद्र में फेंक दिया गया था।

और फिर मेरी दुनिया तब टूटी जब मैंने टीवी पर राघव की पत्नी की तस्वीर देखी। वह महिला… अहाना जैसी दिखती थी। नहीं, वह अहाना ही थी।

मैं काँप गया। मैंने तुरंत अख़बारों और ऑनलाइन आर्टिकल में गहराई से खोजना शुरू किया। राघव की पत्नी का नाम भी अहाना था। वह एक साल पहले अचानक लापता हो गई थी, और पुलिस को शक था कि शायद राघव ने ही उसे मारकर ग़ायब कर दिया। लेकिन अब जब राघव ख़ुद मरा हुआ पाया गया था, तो मामला उलझ गया था।

शाम को जब अहाना घर आई, तो मैंने शांत चेहरे से उसे कॉफ़ी दी। हम बालकनी में बैठे, और मैंने सीधे पूछा।

“राघव, वह तुम्हारा पति था, है न?”

अहाना का कप ज़ोर से काँप गया। कॉफ़ी छलक कर उसके हाथ पर गिरी, पर उसे महसूस नहीं हुई। उसकी सुंदर आँखें अब डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी जीत की भावना से चमक रही थीं।

“हाँ, वीर। वह मेरा पति था। जिसे मैंने छोड़ा था। जिससे मैं भागी थी।” उसकी आवाज़ बेहद शांत थी, इतनी शांत कि तूफ़ान का आभास हो।

“और अब वह मर चुका है,” मैंने कहा।

“हाँ।”

मैंने धीरे से उसके हाथ से कप ले लिया। “तुमने उसे मारा, अहाना? क्या तुम एक मर्डरर हो?”

वह खड़ी हो गई। रात के अँधेरे में उसका सिल्हूट एक शिकारी जैसा लग रहा था। “वीर, मैं एक पीड़ित थी। राघव एक जानवर था। उसने मुझे साल भर नरक दिखाया। वह मुझे मार डालता। वह मुझे सिर्फ़ अपना खिलौना समझता था। जब मैं भागी, तो उसने मेरे माँ-बाप को तबाह करने की धमकी दी। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

वह मेरी तरफ़ बढ़ी। “उस रात, जब हम पहली बार मिले थे, उसके कुछ घंटे पहले मैंने उसे ख़त्म किया था। वह बचपन का ज़ख़्म जो मैंने तुम्हें दिखाया था… वह बचपन का नहीं था। वह मेरे संघर्ष का निशान था। मैंने उसे अपने फ़्लैट में मारा, उसी चाबी वाले बक्से में उसकी लाश को भरा, और फिर तुम्हारे पास भागी। मुझे पता था कि तुम मुझे बचा लोगे।”

मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। यह हसीन दिलरुबा केवल प्रेम की प्यासी नहीं थी; वह अपने बचाव के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी। उसने मुझे अपनी सुरक्षा ढाल बनाया था। हमारे प्रेम की हर साँस, हर अंतरंग पल, एक शातिर योजना का हिस्सा था।

“तुमने मुझे एक मर्डर मिस्ट्री में फँसा दिया,” मैंने बुदबुदाया। मेरे दिल में गुस्सा और विश्वासघात का गहरा दर्द उठा।

अहाना ने अपने हाथ मेरे गालों पर रखे। उसका स्पर्श अब भी उतना ही मोहक था, पर उसमें ख़ून की गंध थी। “फँसाया नहीं, वीर। मैंने तुम्हें चुना। मैंने उस रात तय किया था कि अगर मैं आज़ाद ज़िंदा बची, तो तुम्हारा प्यार मेरा ईनाम होगा। तुम जानते थे कि मैं किसी चीज़ से डर रही हूँ। लेकिन तुमने कभी सवाल नहीं किया। तुमने सिर्फ़ प्यार किया।”

जुनून की हद और खूनी इकरार

मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मैं एक तरफ़ उसे धक्का देकर पुलिस को बुला सकता था। दूसरी तरफ़… मैं उसे कसकर गले लगाना चाहता था।

यह कैसा विरोधाभास था? उसने मेरे विश्वास को तोड़ा था, पर उसने जो भी किया, वह आज़ादी के लिए किया था। और मेरे अंदर का जूनूनी प्रेमी यह मानने को तैयार था कि उसका अपराध भी उसी के जितना सुंदर है। मेरी मोहब्बत इतनी गहरी थी कि वह अब नैतिकता की रेखा पार कर चुकी थी।

मैंने उसकी कमर को पकड़ा और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया। “तुम मुझे इस्तेमाल कर रही थी।”

“हाँ,” उसने इकरार किया। उसकी आँखें खुली थीं और अब वह डर से पूरी तरह आज़ाद थी। “क्या तुम मुझे सज़ा दोगे?”

सज़ा? इस हसीन कातिल को? नहीं। मेरा जुनून अब उसके अपराध को अपना अपराध बनाने को तैयार था।

“तुम्हारी आज़ादी मेरी आज़ादी है,” मैंने कहा। मैंने उसे ज़ोर से चूमा, एक ऐसा चुंबन जिसमें आक्रोश, स्वीकृति और एक नया, ख़तरनाक वादा था।

उस रात, अहाना और मैं दोबारा बेडरूम में गए। इस बार, हमारी इंटीमेसी एक भयानक सच्चाई पर आधारित थी। हर स्पर्श में अब एक डर, एक रोमांच और एक गहरे अपराधबोध का एहसास था, जो जुनून को और भी तेज़ कर रहा था। जब उसने अपनी उँगलियाँ मेरी छाती पर फेरी, तो मैंने महसूस किया कि वह सिर्फ़ प्रेमी नहीं, वह मेरी पार्टनर इन क्राइम बन चुकी थी।

उसने धीरे से मेरे कान में फुसफुसाया, “वह बक्सा, वीर… वह अब भी मेरे पुराने फ़्लैट के तहखाने में है। पुलिस को वह कभी नहीं मिलेगा, पर हमें उसे हमेशा के लिए ठिकाने लगाना होगा।”

मैं उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई डर नहीं था, केवल भरोसा था। मेरे लिए, इस दुनिया में अब दो ही लोग थे: मैं और मेरी दिलरुबा, जिसके हाथ ख़ून से सने थे।

“हम उसे कल रात ठिकाने लगाएँगे,” मैंने कहा। “अब तुम सो जाओ। तुम थक गई होगी।”

वह मुस्कुराई। उसकी वह मुस्कान स्वर्ग की किसी अप्सरा जैसी थी, लेकिन मैं जानता था कि यह मुस्कान सीधे नरक से आई थी।

अगले कुछ पल पूरी तरह समर्पण के थे। हमने एक दूसरे को इस तरह छुआ, जैसे यह हमारी आख़िरी रात हो, जैसे पुलिस किसी भी वक़्त दरवाज़ा तोड़ सकती हो। यह प्रेम अब पवित्र नहीं था; यह ख़तरनाक, अश्लील और अनैतिक था। और यही इसे और भी नशीला बना रहा था। मैंने अपने भीतर के सारे नैतिक बंधन तोड़ दिए थे। मैं अब सिर्फ़ अहाना का था, उसके अपराध का संरक्षक।

और तब आया वह पल, जो मेरी रूह को हमेशा के लिए जमा देने वाला था।

जब हम थके हुए, पसीने से भीगे हुए लेटे थे, अहाना गहरी नींद में चली गई। मैंने उसके बाएँ कंधे पर देखा, जहाँ वह पुराना ज़ख़्म का निशान था। मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उस ज़ख़्म को टटोला।

यह बचपन की चोट नहीं थी। यह राघव के प्रतिरोध का निशान भी नहीं था।

यह निशान पुराना था, लेकिन यह किसी और की वजह से नहीं पड़ा था।

मुझे अचानक याद आया, तीन साल पहले, जब मैं अपनी कंपनी में कुछ भयानक वित्तीय धांधली में फँस गया था। बचने का कोई रास्ता नहीं था। मैंने आत्महत्या का मन बना लिया था। मेरी पत्नी, प्रिया, जिसने मेरे बुरे वक़्त में मेरा साथ देने से इंकार कर दिया था, ने उस रात मुझे अपमानित किया था। और उस रात, गुस्से के एक भयानक क्षण में, मैंने उसे… उस ज़ख़्म को ठीक उसी जगह पर, ठीक उसी तरीक़े से मारा था।

मैं काँप गया। अहाना मेरे बगल में लेटी थी, उसके चेहरे पर शांति थी।

वह ज़ख़्म का निशान… वह मेरा बनाया हुआ था। लेकिन प्रिया तो मर चुकी थी।

मैंने धीरे से अहाना की तरफ़ देखा। उसका चेहरा, उसकी आँखें, उसका जिस्म… सब कुछ मेरी मरी हुई पत्नी, प्रिया, जैसा था।

अचानक मेरे दिमाग़ में सारी कड़ियाँ जुड़ गईं। राघव, जिसने अपनी पत्नी को मार डाला था, दरअसल… वह अहाना (या प्रिया) की बहन थी, जो राघव के अत्याचारों से तंग आकर भागी थी। या शायद, अहाना मेरी प्रिया ही नहीं थी।

अहाना की आँखें खुलीं। वह मुझे घूर रही थी। उसकी आँखें अब भयावह रूप से परिचित थीं।

“तुमने मुझे पहचान लिया, वीर?” उसने पूछा। उसकी आवाज़ में तीन साल पहले का वही तिरस्कार था।

“प्रिया… तुम ज़िंदा हो?” मेरे मुँह से मुश्किल से निकला।

“प्रिया नहीं, वीर। यह मैं हूँ, अहाना। प्रिया तो तुम मार चुके थे, तीन साल पहले। लेकिन मैं उसकी जुड़वाँ बहन हूँ। या शायद… मैं ही प्रिया हूँ जिसने प्लास्टिक सर्जरी करवा ली। क्या फ़र्क पड़ता है? असली फ़र्क़ यह है कि तुम आज भी उतने ही कमज़ोर हो, और तुम्हारा जुनून उतना ही ख़तरनाक।”

वह मेरे क़रीब आई। “राघव… वह मेरा बॉयफ्रेंड था जिसने तुम्हें फँसाने में मेरी मदद की। यह सारा खेल तुम्हें एक ऐसे अपराध में फँसाने का था जिसका बोझ तुम ढो सको। अब तुम राघव की लाश ठिकाने लगाओगे, और जब पुलिस तुम्हें पकड़ेगी, तो तुम टूट जाओगे। तब दुनिया देखेगी कि वीर, एक सफल आदमी, एक ख़ूनी है।”

उसके चेहरे पर जीत का उल्लास था। यह प्रेम कहानी नहीं थी। यह एक हसीन, शातिर, बदला लेने वाली दिलरुबा की मर्डर मिस्ट्री थी, जिसके केंद्र में मैं था-एक जुनूनी प्रेमी और अब, एक भावी अपराधी।

लेकिन अहाना ने एक चीज़ का अंदाज़ा ग़लत लगाया था। मेरा जुनून उसे तबाह कर देगा, यह उसका मानना था। पर मेरा जुनून अब और भी गहरा हो गया था।

मैंने उसकी आँखों में झाँका। “तुम सही हो, अहाना। मैं एक ख़ूनी हूँ। और मैं तुम्हारी इस मर्डर मिस्ट्री को पूरी शिद्दत से खेलूँगा। लेकिन इस खेल का अंत तुम तय नहीं करोगी।”

मैंने उसे पलटा और उसे बिस्तर में दबा दिया। मेरे स्पर्श में अब प्रेम नहीं था, सिर्फ़ स्वामित्व और भयानक इरादा था। वह विरोध करने लगी, लेकिन मेरी ताक़त मेरे जुनून से आई थी।

“तुम मेरी हो, अहाना। मरी हुई हो या ज़िंदा, कातिल हो या शिकार, तुम मेरी हो। और मैं तुम्हें किसी और के पास नहीं जाने दूँगा। न पुलिस के पास, न आज़ादी के पास।”

उस रात, हमने अपने अपराधों को एक दूसरे में मिला दिया। अहाना ने मुझे इस्तेमाल किया, और अब मैं उसे अपनी वासना और पागलपन में इस्तेमाल कर रहा था। उसके विद्रोह की हर चीख़, उसके जिस्म की हर ऐंठन, मेरे लिए विजय का संगीत थी।

जब सुबह की पहली किरणें पैंटहाउस में आईं, अहाना चुप थी, मेरे नीचे बेजान पड़ी थी। उसकी आँखें खुली थीं, उनमें डर या नफ़रत नहीं, सिर्फ़ हार थी।

मैं उठा। मेरे होंठों पर एक नशीली मुस्कान थी। अब राघव की लाश ठिकाने लगाने की बारी थी, लेकिन उससे पहले… मेरे पास एक और ‘लाश’ थी जिसे हमेशा के लिए छिपाना था।

मेरी हसीन दिलरुबा ने मुझे एक ख़ूनी बना दिया था। अब मैं उसे वह प्रेमी बन कर दिखाऊँगा जिसे वह हमेशा याद रखेगी-एक ऐसा प्रेमी जो उसे उस जगह रखेगा जहाँ वह हमेशा से थी: मेरी बाहों में, और दुनिया की पहुँच से हमेशा के लिए दूर।

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