प्यार की प्यास और ख़तरनाक फ़रेब: अपराध-कथा की सबसे ख़तरनाक ‘थर्स्ट ट्रैप’
रात के उस अँधेरे में, जो मुंबई की बरसात से भी ज़्यादा घना था, मुझे पता था कि मैं किस जाल में फँसने जा रही हूँ। इस शहर की हवा में हमेशा ही नमी और किसी अनकही साज़िश की बू आती है। मेरा नाम है ज़ारा- मैं कोई जासूस नहीं हूँ, लेकिन मेरी ज़िन्दगी की हर कहानी रहस्य और हवस की स्याही से लिखी गई है। मेरा काम था- विक्रम राठौर तक पहुँचना। विक्रम- जिसकी ख्याति उसके अवैध धंधों से ज़्यादा, उसके चुंबकीय आकर्षण के लिए थी।
अफ़सरों ने मुझे एक फ़ाइल सौंपते हुए कहा था, “ज़ारा, वह एक ‘थर्स्ट ट्रैप’ है। वह लोगों को अपनी हवस की प्यास बुझाने के लिए इस्तेमाल करता है, फिर उन्हें फेंक देता है। तुम्हें उसका जाल इस्तेमाल करना है, लेकिन ख़ुद को फँसाना नहीं है। वह एक महत्वपूर्ण चिप लिए हुए है, जो हमारे पूरे ऑपरेशन को ध्वस्त कर सकती है।”
‘थर्स्ट ट्रैप’। वासना का वह घातक जाल, जिसमें शिकार ख़ुशी-ख़ुशी खिंचा चला आता है। अपराध-कथाओं में हमेशा यही होता आया है। जासूस या मुखबिर, अपने जिस्म को दाँव पर लगा देते हैं, यह जानते हुए भी कि वह आग उन्हें भस्म कर सकती है। लेकिन इस बार, दाँव पर सिर्फ़ मेरी नौकरी नहीं थी- मेरी रूह थी।
पहला अध्याय: धुएँ और शराब की गंध में लिपटा ख़तरा
विक्रम राठौर मुझे ‘द शैडो रूम्स’ में मिला। यह शहर का वह क्लब था, जहाँ अंधेरा रौशनी से ज़्यादा महंगा बिकता था। दरवाज़े पर ही, मैंने अपने जासूसी उपकरण सक्रिय किए- कमरबंद के भीतर छिपी माइक्रोफ़िल्म और लिपस्टिक के डिब्बे में छिपा ऑडियो रिकॉर्डर। यह सब एक ढोंग था, एक कवच। असली हथियार तो मेरी आँखें थीं- जो जानती थीं कि कैसे ग़लत समय पर नम होना है, और कैसे सही समय पर कठोर।
जब मैंने उसे देखा, तो मुझे महसूस हुआ कि अफ़सरों की चेतावनी कितनी हल्की थी। विक्रम सिर्फ़ आकर्षक नहीं था- वह एक चलती-फिरती, साँस लेती हुई हवस थी। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, उसकी सफ़ेद शर्ट का एक बटन खुला था, जिससे उसके गले की मज़बूत बनावट दिख रही थी। उसकी आँखें- वे गहराइयाँ थीं, जिनमें आप डूबना चाहकर भी डरते थे।
वह बार में बैठा था, अपने ग्लासनुमा व्हिस्की को धीरे-धीरे घुमा रहा था। उसके चेहरे पर एक ऐसी थकावट थी, जो लाखों की दौलत और सैकड़ों अपराधों के बाद आती है।
“तुम खोई हुई लग रही हो,” उसकी आवाज़ ने उस शोरगुल को चीर दिया। यह शहद में लिपटे हुए ब्लेड जैसा था- मीठा और जानलेवा।
मैं उसकी तरफ़ धीरे से मुड़ी। “शायद, मैं पहली बार इतनी रोशनी और इतने अँधेरे को एक साथ देख रही हूँ।”
वह मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान उसकी आँखों तक नहीं पहुँची। “यह रोशनी नहीं है, ज़ारा। यह सिर्फ़ चकाचौंध है। असली चीज़ें हमेशा अंधेरे में छिपी होती हैं।”
और इसी पल, हमारा खेल शुरू हो गया। मैं उसकी तरफ़ एक प्यास लिए हुए आकर्षित हो रही थी, और वह मेरी तरफ़ एक जाल लिए हुए बढ़ रहा था। कौन पहले वार करेगा? किसका जिस्म पहले झुकेगा?
दूसरा अध्याय: वासना की परतें और झूठ की सच्चाई
अगले कुछ दिन, हमारी मुलाक़ातें एक खतरनाक नृत्य की तरह थीं। हम बातें कम करते थे, और एक-दूसरे को छूने के मौके ज़्यादा ढूँढ़ते थे। वह जानता था कि मुझे उससे क्या चाहिए- या कम से कम, वह सोचता था कि वह जानता है। वह मुझे अपने अतीत के बारे में बताता- टूटे हुए सपने, बेईमानी की कहानियाँ- सब कुछ इतना सच्चा लगता था कि मेरी पेशेवर सतर्कता बार-बार ढीली पड़ जाती थी।
एक रात, उसके पेंटहाउस में- जहाँ शहर की सारी जगमगाहट पैरों तले दबी लगती थी- माहौल बहुत भारी था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। हमने काफ़ी देर तक बात की थी, या शायद हमने सिर्फ़ एक-दूसरे की आँखों में झाँका था। वह मेरी तरफ़ आया।
“तुम यहाँ क्यों हो, ज़ारा?” उसने पूछा, उसकी उँगलियाँ मेरे चेहरे को छूती हुई मेरे बालों में उलझ गईं। “सच बताओ- तुम मेरे लिए एक रात की चाहत रखती हो, या तुम कुछ और ढूँढ रही हो?”
मैंने उसकी टी-शर्ट की कॉलर को पकड़ा, मेरी साँसें तेज़ हो गईं। वह चिप- वह चिप कहीं यहीं थी। मुझे उसे उकसाना था, उसे इस कदर ग़ाफ़िल करना था कि वह अपनी सुरक्षा भूल जाए।
“मैं वह ढूँढ़ रही हूँ, जो तुम्हारे अंदर दबा हुआ है, विक्रम,” मैंने फुसफुसाया। मेरी आवाज़ में वह कच्ची इच्छा थी, जो अपराध-कथाओं की नायिकाओं को हमेशा हारने के कगार पर ला खड़ा करती है। “वह राज़ जो तुम्हें रातों को सोने नहीं देता।”
वह हँस पड़ा। एक छोटी, कड़वी हँसी। “मेरा राज़? मेरा राज़ तो तुम हो, ज़ारा। तुम मुझे देखने आती हो, और मैं तुम्हें देखता हूँ। यह सब एक थर्स्ट ट्रैप है- हम दोनों एक-दूसरे की प्यास बुझाना चाहते हैं।”
उस पल, मैंने अपनी सारी ट्रेनिंग, अपने सारे नियम ताक पर रख दिए। अपराध-कथा का नियम है- जब तक तुम पूरी तरह समर्पण नहीं करोगे, तब तक तुम सच्चाई तक नहीं पहुँचोगे। और इस खेल में, समर्पण का मतलब था- शारीरिक और भावनात्मक- दोनों तरह से नग्न हो जाना।
तीसरा अध्याय: जिस्मों की आग और चिप का रहस्य
कमरे की बत्तियाँ डिम थीं, सिर्फ़ चाँद की रौशनी खिड़की के पर्दे से छनकर आ रही थी। हमारी साँसों की गरमाहट ने कमरे की हवा को और भारी कर दिया। उसने मुझे अपनी बाहों में उठाया। यह कोई कोमल स्पर्श नहीं था- यह एक दावा था, एक अधिकार।
“तुम एक ख़तरा हो, ज़ारा,” उसने मेरे होंठों पर झुकते हुए कहा।
“और तुम, विक्रम,” मैंने जवाब दिया, “तुम वह ख़तरा हो जिससे मैं बचना नहीं चाहती।”
हमारा मिलन- वह आग थी, जिसने सब कुछ जला दिया। यह सिर्फ़ दो जिस्मों का जुड़ाव नहीं था, यह दो ज़ख़्मी आत्माओं का संघर्ष था। हर स्पर्श, हर किस- एक सवाल था। क्या तुम मुझे धोखा दे रहे हो? क्या मैं तुम्हें धोखा दे रही हूँ?
उसके मज़बूत हाथ मेरे बदन पर घूम रहे थे, और मेरे हाथ उसके सारे राज़ टटोल रहे थे। मैं जानती थी कि वह चिप उसके पास ही होगी। शायद लॉकेट में, शायद घड़ी के पट्टे में, शायद-
जब हम एक-दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे, जब उसके शरीर की गर्मी मुझे इस कदर अपनी गिरफ़्त में ले चुकी थी कि मैं लगभग भूल चुकी थी कि मैं यहाँ क्यों हूँ, तब मेरी उँगलियाँ उसकी कलाई पर पड़ीं। वह अपनी एक पुरानी, महंगी घड़ी कभी नहीं उतारता था। उस घड़ी का पट्टा चमड़े का नहीं था- वह धातु का था, और थोड़ा मोटा था।
उसने जब अपना सर मेरे कंधे पर रखा, उसकी साँसें तेज़ थीं, तो मैंने एक पल का फ़ायदा उठाया। मेरे नख थोड़े तेज़ थे, और मैंने धीरे से, बिना किसी कोमलता के, उस घड़ी के पट्टे के किनारे को टटोला।
हाँ! वहाँ एक छोटा-सा, लगभग अदृश्य-सा, उभार था। धातु के भीतर, एक बारीक सा स्लॉट।
विक्रम ने अचानक अपनी आँखें खोलीं। “क्या हुआ?” उसकी आवाज़ नशे में थी, लेकिन अब उसमें संदेह की एक तीखी धार थी।
मैंने तुरंत अपनी उँगली हटाई और अपने होंठों को उसके होंठों पर दबा दिया। “कुछ नहीं,” मैंने धीरे से कहा। “बस- यह पल… यह आग।”
वह फिर से मेरी इच्छाओं की गहराई में डूब गया। यह सब एक भयानक, सुंदर नाटक था। मैं उसकी हवस का इस्तेमाल कर रही थी, और वह शायद मेरी हवस को अपनी बेगुनाही का सबूत समझ रहा था। हम दोनों ही आग से खेल रहे थे, यह जानते हुए भी कि अंत में कोई एक ज़रूर जलेगा।
जब वह गहरी साँस लेकर, थोड़ी देर के लिए नींद और थकान के बीच झूल रहा था, मैंने तेज़ी से काम किया। मेरी ट्रेनिंग मेरे काम आई। मेरे पास हमेशा एक पतली पिन होती थी- यह मेरे बालों में छिपी थी। मैंने धीरे से उस घड़ी के पट्टे को खोला। वह चिप- वह नैनो-चिप- सचमुच वहाँ थी, एक छोटे-से गुप्त खाने में छुपी हुई।
मैंने उसे निकाल लिया। उसका आकार इतना छोटा था कि मेरी हथेली की रेखाओं में खो गया। मिशन पूरा हो चुका था। थर्स्ट ट्रैप ने अपना काम कर दिया था।
चौथा अध्याय: सुबह का कड़वा सच और अलविदा
मैं बिस्तर से उठी। मेरा बदन टूट रहा था, लेकिन मेरा दिमाग़ तेज़ रफ़्तार से चल रहा था। मैंने कपड़े पहने। कमरे में अब भी उसकी गंध भरी थी- व्हिस्की, पसीना और एक अजीब-सी ताक़त की गंध।
मुझे जाना था। अब और रुकना ख़तरे से खाली नहीं था। अगर वह जाग जाता और देखता कि चिप ग़ायब है, तो मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।
लेकिन जैसे ही मेरा हाथ दरवाज़े के हैंडल तक पहुँचा-
“जा रही हो, ज़ारा?”
विक्रम खड़ा था। वह नंगा था, लेकिन उसके खड़े होने के तरीके में एक अजीब-सी राजाशाही थी। उसकी आँखें- वे अब पूरी तरह से जागी हुई थीं, और उनमें कोई प्यार या वासना नहीं थी। सिर्फ़ ठंडा, कठोर संदेह था।
“हाँ,” मैंने पलटकर कहा, अपनी आवाज़ को यथासंभव शांत रखते हुए। “रात हो गई है। मुझे जाना होगा।”
“और मेरी घड़ी का पट्टा कहाँ है?” उसने पूछा। उसकी आवाज़ अब शहद नहीं थी, बल्कि पिघला हुआ लोहा थी।
मेरा दिल मेरे सीने में ज़ोर से धड़का। क्या उसने मुझे देख लिया था? क्या वह हमेशा से जानता था?
“पता नहीं,” मैंने झूठ बोला। “शायद बिस्तर पर गिर गया होगा।”
विक्रम धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ा। हर कदम के साथ, मेरे पीछे का दरवाज़ा दूर होता गया, और ख़तरा नज़दीक आता गया। उसने मेरे पास आकर, मेरी ठुड्डी को पकड़ा। उसके स्पर्श में अब भी रात की बची-खुची गरमाहट थी, लेकिन उसके इरादे बर्फीले थे।
“हम दोनों ने ही एक-दूसरे को बहकाया, ज़ारा। तुमने मेरे राज़ के लिए, और मैंने शायद… शायद किसी और चीज़ के लिए। तुमने मुझसे जो कुछ लिया है, वह सिर्फ़ चिप नहीं है। तुमने मुझे वह कमज़ोरी दिखाई, जो मुझे हज़ारों लोगों से छिपाकर रखनी पड़ी।”
उसने मेरी हथेली को पकड़ा, जहाँ चिप छिपी थी। वह जान गया था। या शायद वह हमेशा से जानता था कि मैं एक जासूस हूँ- एक ख़तरनाक फ़रेब।
“तुम बहुत ख़ूबसूरत हो,” उसने कहा, उसके चेहरे पर एक जटिल भाव था- नफ़रत, प्रशंसा, और एक गहरी उदासी। “इतनी ख़ूबसूरत कि मैं भूल गया कि तुम यहाँ मुझे प्यार करने नहीं आई थी। तुम मुझे तोड़ने आई थी।”
मैं वहाँ खड़ी रही, चिप मेरी मुट्ठी में थी। मैं जीत चुकी थी- लेकिन जीत का स्वाद कड़वा था। यह अपराध-कथा का नियम है: थर्स्ट ट्रैप में, शिकारी अक्सर शिकार से ज़्यादा घायल हो जाता है।
“क्या यह सब झूठ था, विक्रम?” मैंने पूछा। यह एक व्यक्तिगत सवाल था, पेशेवर नहीं।
उसने एक पल के लिए मेरी आँखों में देखा। वह पल, जिसमें मुंबई की सारी रातें सिमटी थीं।
“जब मैं तुम्हारे अंदर था, ज़ारा,” उसने फुसफुसाया, “उस वक्त… नहीं। उस वक्त, वह सच्चाई थी। लेकिन अब, जब तुम वह फ़ाइल लेकर जा रही हो… यह फिर से एक ख़तरनाक खेल है। जाओ। लेकिन याद रखना- यह खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ है।”
उसने मुझे छोड़ दिया। मुझे जाने दिया। यह उसकी ताक़त थी- वह मुझे बिना किसी हिंसा के तोड़ सकता था। मैं तेज़ी से भागी, चिप को सीने से लगाए। बारिश अब भी तेज़ थी, और हवा में अब भी साज़िश की बू थी।
मेरा मिशन सफल था। चिप मेरे पास थी। लेकिन जब मैं गाड़ी में बैठी, तो मुझे महसूस हुआ कि मेरा जिस्म अब भी उसकी हवस की तपिश महसूस कर रहा है। वह ‘थर्स्ट ट्रैप’- वह सिर्फ़ उसके लिए नहीं था। वह मेरे लिए भी था। अब मेरी रूह में एक खालीपन था, जो सिर्फ़ सच्चाई से नहीं, बल्कि उस झूठे प्यार की आग से भरा था, जिसे मैंने खुद भड़काया था।
अपराध-कथाओं में, सबसे बड़े राज़ अक्सर बेडरूम में छिपे होते हैं, जहाँ प्यार एक हथियार बन जाता है, और हवस- सत्य को जानने का सबसे ख़तरनाक ज़रिया। मैं आज़ाद थी, लेकिन शायद, मैं हमेशा के लिए उसकी थर्स्ट ट्रैप में फँस चुकी थी।
- ज़ारा- एक जासूस जो भावनाओं के जाल में फँसी।
- विक्रम- वह ‘थर्स्ट ट्रैप’ जिसका आकर्षण एक घातक हथियार था।
- चिप- वह रहस्य, जो प्यार और वासना के बीच चुराया गया।
- परिणाम- जीत हासिल हुई, पर दिल हार गया।








