
‘ज़हरीला जाल’: प्यास, प्यार और अपराध की स्याही
एक लेखक के रूप में, मैंने हमेशा माना है कि अपराध की जड़ें बंदूक या ज़हर में नहीं होतीं- वे हमेशा हमारी सबसे गहरी, सबसे निजी इच्छाओं में होती हैं। मैं- माया शर्मा- अपने उपन्यासों में इसी सच्चाई को खंगालती हूँ। अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि मेरे किरदारों का प्यार इतना घातक क्यों होता है। मेरा जवाब सीधा है: क्योंकि जब वासना और अपराध मिलते हैं, तो जो चिंगारी उठती है, वह जंगल की आग से भी ज़्यादा ख़तरनाक होती है।
यह सिर्फ़ ‘फ़ेम फ़ेटेल’ की पुरानी कहानी नहीं है। यह उससे कहीं ज़्यादा सूक्ष्म है। यह ‘थर्स्ट ट्रैप’ (मोह का फंदा) है- जहाँ आकर्षण, कामुकता और प्रेम का प्रदर्शन एक सुनियोजित हथियार बन जाता है। एक ऐसी रणनीति जो शिकारी को नहीं, बल्कि शिकार को यह महसूस कराती है कि उसने ही यह शिकार शुरू किया है।
आज मैं आपको ‘ज़हरीला जाल’ की कहानी सुनाती हूँ- यह मेरा नया मसौदा है, और यह मेरे जीवन का वह हिस्सा भी है जो शायद मैंने कभी किसी को बताया नहीं। यह उस ACP देव की कहानी है, जो हमेशा क़ानून की मोटी किताब में छुपा रहा- और उस हसीना, नैना की, जिसने उसे उस क़िताब से बाहर खींचकर अँधेरे की स्याही में डुबो दिया।
मोह का पहला स्पर्श: ACP देव और नैना
देव, मुंबई पुलिस के अपराध नियंत्रण विभाग का रीढ़ की हड्डी जैसा अफ़सर था। तीस की उम्र पार, शादीशुदा जीवन की ऊब और पेशेवर ज़िंदगी की नीरसता से घिरा। उसका शरीर मज़बूत था, उसका दिमाग़ तेज़, लेकिन उसकी आँखें- वे हमेशा कुछ और खोजती रहती थीं। कुछ ऐसा- जो उसे ज़िंदा महसूस कराए।
फिर एक रात, बारिश के शोर में, उसके सामने आई नैना। एक हाई-प्रोफ़ाइल मनी लॉन्ड्रिंग केस की एकमात्र गवाह- या शायद मुख्य संदिग्ध। जब वह थाने में लाई गई, उसके बाल गीले थे, सफ़ेद कुर्ते पर बारिश की बूँदें हीरे की तरह चमक रही थीं। वह सहमी हुई लग रही थी- कमज़ोर, डरी हुई।
“सर- मुझे डर लग रहा है।” उसकी आवाज़ हल्की, लगभग फुसफुसाहट जैसी थी।
देव ने अपनी नज़रें फ़ाइल पर टिकाए रखीं। “डरने की ज़रूरत नहीं। सच बताओ, और तुम सुरक्षित हो।”
नैना उसके सामने रखे सोफ़े पर बैठी थी। उसकी मुद्रा में एक अजीब सी भंगिमा थी- जहाँ वह मदद माँग रही थी, वहीं अनजाने में अपना सम्मोहन फैला रही थी। यह सम्मोहन जानबूझकर था। यह नैना का पहला और सबसे प्रभावी ‘थर्स्ट ट्रैप’ था- कमज़ोरी का प्रदर्शन।
देव जानता था कि ऐसी महिलाएँ कितनी ख़तरनाक हो सकती हैं। वह विषकन्याएँ जो अपने होंठों पर शहद और अपनी साँसों में ज़हर छुपाती हैं। फिर भी- उस रात, उस बारिश और उस उदास कमरे में- नैना की आँखें उससे कुछ ऐसा कह रही थीं जो उसने वर्षों से नहीं सुना था: *पहचान।*
“आप बहुत थके हुए लगते हैं, सर।” उसने अचानक कहा।
देव ने सिर उठाया। “यह मेरा काम है।”
“आपका काम… या आपकी सज़ा?” उसकी बात में न कोई आरोप था, न कोई व्यंग्य- बस एक गहरी समझ थी। यह नैना की दूसरी चाल थी- भावनात्मक निकटता। उसने कुछ ही पलों में देव की आत्मा की दीवारें तोड़ दी थीं, जो सालों से उपेक्षा के सीमेंट से बनी थीं।
जाँच आगे बढ़ी। देव को नैना से हफ़्ते में कई बार मिलना पड़ता था। हर मुलाकात में, अपराध की परतें कम और अंतरंगता की परतें ज़्यादा खुलती थीं। नैना अपने जीवन की कहानियाँ सुनाती- टूटे हुए बचपन की, खोए हुए प्रेम की। वह रोती- और देव, जो देश के सबसे खूँखार अपराधियों को भी बिना पलक झपकाए देखता था, नैना के आँसुओं के आगे पिघल जाता था।
- वह उसकी कहानी सुनता था- पेशेवर दूरी को ताक पर रखकर।
- वह उसे रात के खाने के लिए बुलाता था- सुरक्षा कारणों का बहाना बनाकर।
- वह उसे छूता था- सिर्फ़ तसल्ली देने के लिए, लेकिन यह स्पर्श हमेशा उसकी कमर पर या कंधे पर ज़रूरत से ज़्यादा देर तक ठहरता था।
देव अब केवल एक ACP नहीं था। वह एक आदमी था, जो एक जाल में फँस रहा था- स्वेच्छा से। उसे नैना के निर्दोष होने पर संदेह था, लेकिन उसकी देह और उसके मन का एक हिस्सा इस संदेह को दबाए रखता था। क्योंकि नैना उसे वह दे रही थी जो उसके जीवन से लापता था- रोमांच, और तीव्र चाहत।
अँधेरे में लिपटी रात: जब वासना ने विवेक को हराया
वह रात अब भी मेरे (माया शर्मा के) उपन्यास का सबसे दर्दनाक अध्याय है। वह रात जब केस फ़ाइलें मेज़ पर धरी रह गईं, और देव ने क़ानून की सभी रेखाओं को पार कर दिया।
नैना का अपार्टमेंट- एक मखमली अँधेरे से भरा हुआ कमरा। बाहर मुंबई की उमस और बारिश ज़ोरों पर थी। नैना ने देव को बुलाया था। आधिकारिक तौर पर- कुछ ज़रूरी काग़ज़ात पर हस्ताक्षर करवाने के लिए। अनौपचारिक तौर पर- अपने प्यास के जाल को आख़िरी झटका देने के लिए।
देव पहुँचा तो नैना एक पतली सिल्क की नाइटी में थी। उसके चेहरे पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक गर्मजोशी थी, एक आमंत्रण।
“देव- आज रात तुम ACP नहीं हो। तुम सिर्फ़ देव हो।” उसने अपने होंठों को हल्के से दबाते हुए कहा।
और उस पल- दशकों की पेशेवर निष्ठा टूट गई। देव की आँखों में वह भूख थी जो वह सालों से दबाए हुए था। नैना ने धीरे से उसके चेहरे को छुआ। उसका स्पर्श इतना नर्म था कि जैसे उसने बरसों बाद अपनी त्वचा पर कोई राहत महसूस की हो।
“तुम मुझे बचाओगे ना, देव?” उसने पूछा।
वह बचाना नहीं चाहता था- वह उसे पाना चाहता था। यह ‘बैड लव, गुड सेक्स’ की सटीक परिभाषा थी। जो पल वे साथ बिताने वाले थे, वह अपराध बोध से भरा होगा, लेकिन उस पल की तीव्र इच्छा उस अपराध बोध से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली थी। यह शारीरिक और भावनात्मक मुक्ति का ऐसा दुर्लभ मिश्रण था, जो केवल तभी मिलता है जब आप जानते हैं कि आप एक ख़तरनाक सीमा पार कर रहे हैं।
वे गले मिले- यह मिलन नहीं, बल्कि एक विस्फोट था। नैना की साँसों की गर्मी ने देव के ठंडे पड़ चुके विवेक को जला डाला। कमरे में तेज़ी से धड़कते दिल की आवाज़ और बारिश का शोर- सब एक-दूसरे में घुलमिल गए। नैना हर पल, हर स्पर्श में- उसे यह महसूस करा रही थी कि वह दुनिया का सबसे ज़रूरी इंसान है, जिसे कोई देख नहीं पाया था, लेकिन उसने पहचान लिया था। यह सबसे बड़ा ‘थर्स्ट ट्रैप’ था- ज़रूरत की भावना पैदा करना।
उनके बीच की रात लंबी थी। अंतरंगता के हर क्षण में, नैना ने ज़हर को शहद की तरह फैलाया। उसकी आहें, उसकी आँखें, उसके होंठ- सब देव को यह विश्वास दिला रहे थे कि यह सिर्फ़ वासना नहीं है, यह प्रेम है- सच्चा, निडर प्रेम। देव ने अपने सारे सवाल, सारे संदेह उस कमरे की दहलीज पर छोड़ दिए थे। उसने अपने सबसे बड़े दुश्मन पर भरोसा कर लिया था- अपनी इच्छाओं पर।
ज़हर का स्वाद: जब पर्दा उठा
अगले दिन, देव उठा तो नैना जा चुकी थी। कमरे में सिर्फ़ उसकी ख़ुशबू थी- और एक ठंडा, खालीपन भरा अहसास। शुरुआत में, उसने सोचा कि वह जल्दी निकल गई होगी।
जब वह दफ़्तर पहुँचा, उसे तुरंत केस की प्रगति के बारे में जानकारी मिली। नैना, जो अब तक ‘गवाह’ थी, वह मुख्य अभियुक्त थी। सिर्फ़ मनी लॉन्ड्रिंग में नहीं, बल्कि पिछले साल हुए एक ख़ून में भी। और सबसे ख़ौफ़नाक तथ्य- वह एक प्रशिक्षित गुप्तचर थी, जो सालों से इस केस में शामिल लोगों को फँसाने के लिए ऐसे ही ‘मोह के फंदों’ का इस्तेमाल करती आई थी।
देव का सिर घूम गया। उसका शरीर पसीने से भीग गया- यह एसीपी देव नहीं, बल्कि एक मूर्ख और धोखे में रहा हुआ प्रेमी था।
उसने तुरंत नैना के अपार्टमेंट में वापस जाने का फ़ैसला किया। इस बार, वह ACP की वर्दी में था। जब वह दरवाज़ा तोड़कर अंदर गया, तो कमरा साफ़ था। कोई सुराग नहीं। सिर्फ़ एक छोटी मेज़ पर रखी एक डायरी।
डायरी खुली थी। नैना की हस्तलिपि- ख़ूबसूरत, लेकिन घातक। उसमें लिखा था-
- 10 मई: ACP देव. बहुत कठोर लगता है, पर अंदर से भूखा है। लक्ष्य 1: उसे सहानुभूति देनी है।
- 14 मई: वह मेरी कहानियों पर यक़ीन कर रहा है। पेशेवर दूरी टूट रही है। लक्ष्य 2: उसे ‘सेवियर’ (बचाने वाला) महसूस कराना है।
- 18 मई: काम हो गया। उसकी आँखों में अब क़ानून नहीं, सिर्फ़ चाहत है। उसने मुझे बचाने का वादा किया है, भले ही वह क़ानून के ख़िलाफ़ हो। जाल सफल।
वह एक रिकॉर्ड था। उनके प्रेम की कहानी नहीं- बल्कि उसकी चालबाज़ी का दस्तावेज़। कल रात का प्यार- उसकी शारीरिक भाषा, उसकी आहें, उसके शब्द- सब स्क्रिप्टेड थे। देव को महसूस हुआ कि उसे सिर्फ़ धोखा नहीं दिया गया, बल्कि उसका इस्तेमाल किया गया। उसे महसूस हुआ कि उसकी आत्मा को छीन लिया गया है।
उसका सबसे बड़ा अपराध यह नहीं था कि उसने केस को बर्बाद किया, बल्कि यह कि उसने अपनी सबसे निजी, सबसे कच्ची भावना को एक विषकन्या के हाथ में सौंप दिया, जिसने उसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
लेखक की मेज़ पर चिंतन
मैं, माया शर्मा, अपनी कुर्सी पर वापस बैठती हूँ। ‘ज़हरीला जाल’ का यह अध्याय ख़ून और गोली से ज़्यादा दर्दनाक है। क्यों? क्योंकि बंदूक़ शरीर को मारती है, लेकिन ‘थर्स्ट ट्रैप’ आत्मा को मारता है। यह वह सच्चाई है जिसे अपराध कथाएँ बार-बार दोहराती हैं।
देव कभी नैना को पकड़ नहीं पाया। वह केस बंद हो गया। लेकिन देव- वह कभी सामान्य नहीं हो पाया। नैना ने सिर्फ़ उसे धोखा नहीं दिया, उसने उसे वह आईना दिखाया जिसमें उसे अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी दिखी- अकेली, अप्रसन्न आत्मा की प्यास।
जब हम अपराध कथाओं में ‘बैड लव, गुड सेक्स’ की बात करते हैं, तो हम केवल सनसनी की बात नहीं करते। हम उस मानवीय कमज़ोरी की बात करते हैं जो अंधेरे को आमंत्रित करती है। नैना जैसी महिलाएँ जानती हैं कि सबसे बेहतरीन क़िला भी भीतर की प्यास से ढह जाता है। वे हमारी इच्छाओं को पकड़ती हैं, उन्हें धार देती हैं, और उन्हें हमारे ही ख़िलाफ़ इस्तेमाल करती हैं।
प्रेम और अपराध का यह मिलन हमें सिखाता है कि कुछ ख़ूबसूरत चीज़ें इसलिए बनाई जाती हैं ताकि वे हमें बर्बाद कर सकें। जैसे एक शानदार ज़हर- जो पीने में मीठा लगता है, लेकिन उसका परिणाम मृत्यु के अलावा कुछ नहीं होता। और देव जैसे किरदारों के लिए, सबसे बड़ी सज़ा जेल नहीं है- सबसे बड़ी सज़ा यह याद है कि वह एक रात, उसने ख़ुद को बेचा था- महज़ एक मीठी, लेकिन घातक वासना के बदले।
और यही कारण है कि ‘थर्स्ट ट्रैप’ हमारी कहानियों में अमर है। क्योंकि हम सब, कहीं न कहीं, उस अंधेरे कमरे में ACP देव की जगह खड़े हैं- एक पल के लिए, अपनी ज़िंदगी की ऊब से आज़ादी के लिए, एक ख़ूबसूरत धोखे के सामने अपना सब कुछ लुटाने को तैयार।
मोह का फंदा- यह जाल हमें हमेशा आकर्षित करता रहेगा- क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि हम इंसान हैं, त्रुटियों और तीव्र इच्छाओं से भरे हुए।








