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“मर्डरबाज़ एक्सक्लूसिव: मौत की गुत्थियों के बीच पनपते इश्क़ का नया अंदाज़!”

मुंबई की रात हमेशा की तरह उमस भरी और सघन थी। मलाबार हिल के एक पेंटहाउस की 40वीं मंज़िल पर, जहाँ समुद्री हवा भी पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती थी, माहौल उससे भी ज़्यादा सघन था। यह जगह थी उपन्यासकार अवंतिका सक्सेना का निजी निवास-एक ऐसा कोना जहाँ शब्दों का ज़हर और प्यार की शिफ़ा एक साथ बहती थी।

अवंतिका, अपनी नई बेस्टसेलर ‘खूनी चाँदनी’ की अपार सफलता के बाद, पहली बार ‘मर्डरबाद’ पत्रिका के संपादक रजत शर्मा को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दे रही थीं। अवंतिका की उपस्थिति खुद में एक उपन्यास थी: काले सिल्क का गाउन, आँखों में काजल की एक बारीक रेखा जो उनके रहस्य को और गहरा रही थी, और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान जो वादा और ख़तरा दोनों थी।

रजत शर्मा, अपनी नोटबुक और रिकॉर्डर के साथ, सीधे मुद्दे पर आए।

पहला अध्याय: आग और कागज़

“अवंतिका जी,” रजत ने धीमी, पर तीखी आवाज़ में कहा। “आपकी ‘खूनी चाँदनी’ ने साहित्य जगत में भूचाल ला दिया है। यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह… कुछ और है। मेरा सवाल यह है कि आपका जासूस, समर, और मुख्य आरोपी, नैना, उनके बीच का रिश्ता-यह इतना सच्चा और इतना विचलित करने वाला कैसे हो सकता है? ऐसा लगता है जैसे आपने उस रिश्ते को जिया हो, केवल लिखा न हो।”

अवंतिका ने अपने वाइन ग्लास को उठाया, उसकी लालिमा को परखा। कमरे में महँगी मोमबत्तियों की धीमी रोशनी थी, जो उनके चेहरे के कट्स को और भी नाटकीय बना रही थी।

“रजत जी,” अवंतिका की आवाज़, शहद की तरह मीठी, पर उसमें लोहे की ठंडक थी। “लेखक का काम क्या है? हर उस भावना को जीना जो वह कागज़ पर उतारता है। समर और नैना का संबंध सिर्फ प्रेम नहीं है; यह एक ज़रूरत है। जब मौत आपको चारों ओर से घेर लेती है, जब सच्चाई और झूठ के बीच की रेखा मिट जाती है, तो आप उस एक इंसान को ढूंढते हैं जो आपकी आत्मा की सबसे काली कोठरी में झाँक सके और फिर भी आपको गले लगा ले।”

“लेकिन उस ‘काली कोठरी’ का वर्णन… समर, एक कठोर, अनुशासनबद्ध पुलिस अफ़सर, नैना पर शक कर रहा है कि उसने अपने पति को बेरहमी से मारा है, और फिर भी, वह उसके प्रति इस हद तक आकर्षित होता है कि वह अपने सारे नियम तोड़ देता है। यह आकर्षण, यह संवेदनशीलता, यह इतना सटीक है कि पाठकों को डर लगने लगता है। क्या आप हमें बता सकती हैं कि समर का चरित्र कहाँ से आया? क्या वह आपकी कल्पना का उत्पाद है, या किसी वास्तविक जीवन के ‘शैतान’ से प्रेरित है जिसने आपके सारे सुकून छीन लिए?”

अवंतिका की मुस्कान फीकी पड़ गई। उनकी आँखें दूर क्षितिज में देख रही थीं, मानो वह सचमुच अपने अतीत की धूल भरी फाइलों को पलट रही हों।

“शैतान,” उन्होंने धीरे से दोहराया। “शैतान हमेशा सबसे सुंदर वेष में आता है, रजत जी। और कभी-कभी, वह ख़ुद को न्याय का रखवाला भी बताता है।”

दूसरा अध्याय: पूछताछ का एकांत और इकरार

अवंतिका की पलकें झपकीं, और स्टूडियो की रोशनी उनकी आँखों के पीछे पाँच साल पुरानी बारिश में बदल गई। वह अब अवंतिका नहीं, बल्कि ‘ईशा’ थी, जो अपने मंगेतर, विक्रम की जघन्य हत्या के सदमे से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी। और उसके सामने बैठा था डिटेक्टिव अर्जुन।

अर्जुन, अपनी बेदाग़ वर्दी में, विक्रम के खून से सने अपार्टमेंट की जाँच कर रहा था। ईशा मुख्य संदिग्ध थी-आखिर, हत्या के एक मिनट पहले तक वह विक्रम के साथ थी।

वह रात उनकी पहली लंबी पूछताछ की थी। पुलिस स्टेशन नहीं, बल्कि अर्जुन ने उसे ‘सुरक्षा कारणों’ से अपने सरकारी क्वार्टर के एक शांत कमरे में बुलाया था। रात गहरा चुकी थी। बाहर मूसलाधार बारिश मुंबई की सड़कों पर एक पर्दा डाल रही थी।

“ईशा,” अर्जुन की आवाज़ उस रात अभी भी ड्यूटी की कठोरता लिए हुए थी। “तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो। हर बार जब मैं तुमसे विक्रम के रिश्ते के बारे में पूछता हूँ, तुम्हारी आँखें छलक जाती हैं, लेकिन तुम ख़ुद को रोक लेती हो।”

ईशा सोफे पर सिकुड़ी बैठी थी। उसका डर असली था, लेकिन उस डर के नीचे कुछ ऐसा उबल रहा था जिसने उसके पूरे अस्तित्व को झकझोर दिया था-अर्जुन की स्थिर, भेदी निगाहें। वह हर सवाल के साथ उसे ख़त्म कर रहा था, और हर ख़त्म करने वाली नज़र में एक अजीब सी ललक थी।

“मैं कुछ नहीं छिपा रही हूँ, इंस्पेक्टर,” ईशा फुसफुसाई। “विक्रम मेरा सब कुछ था।”

अर्जुन धीरे से उठा। वह कमरे में टहलने लगा, जैसे अपने अगले शिकार को घेर रहा हो। “क्या वह वाकई सब कुछ था? या वह एक सोने का पिंजरा था, जिसे तुम तोड़ना चाहती थी?”

वह उसके पास आया, बिल्कुल पास। उसकी साँसें ईशा के चेहरे पर महसूस हुईं। उसकी महक, बारिश और सिगार का एक मिला-जुला मिश्रण, ख़तरनाक और मोहक था।

“जब तुम मेरे बारे में अपनी फ़ाइलें पढ़ रहे थे,” ईशा ने हिम्मत जुटाई, “क्या तुमने सोचा कि मैं एक क़ातिल हो सकती हूँ? या तुमने सोचा कि मैं बस एक टूटी हुई औरत हूँ जिसे किसी सहारे की ज़रूरत है?”

अर्जुन ने अचानक अपना हाथ सोफे के पीछे रखा, ईशा को पूरी तरह से घेर लिया। वह शारीरिक निकटता, जो एक जांचकर्ता और संदिग्ध के बीच क़तई नहीं होनी चाहिए थी, बिजली की तरह कमरे में फैल गई।

“तुम क्या चाहती हो, ईशा?” अर्जुन की आवाज़ अब ख़ुद के नियंत्रण से बाहर हो रही थी। “तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें बचाऊँ? या तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे अपराध में भागीदार बन जाऊँ?”

ईशा की आँखें बंद हो गईं। उस पल, उन्हें पता था कि वह सुरक्षित नहीं थी, पर पहली बार, उसे लगा कि वह अपनी सबसे गहरी सच्चाई को व्यक्त कर सकती है।

“मुझे नहीं पता कि मैं क्या चाहती हूँ,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें देखती हूँ, अर्जुन। मैं तुम्हारे अनुशासन के पीछे छिपी हुई उस आग को महसूस करती हूँ। तुम यहाँ न्याय के लिए हो, पर तुम उस सच्चाई से जूझ रहे हो जो तुम्हारे सामने बैठी है। तुम मुझे सज़ा देना चाहते हो, पर तुम्हारे होंठ… कुछ और कह रहे हैं।”

अर्जुन की आँखें अंधेरे में चमक उठीं। उसका नियंत्रण टूट गया। वह झुक गया। वह पूछताछ का कमरा अब एक युद्ध का मैदान था जहाँ कर्तव्य और वासना लड़ रहे थे।

उसका पहला स्पर्श बर्फ़ की तरह ठंडा था, पर तुरंत ही जलते अंगारे में बदल गया। यह चुंबन नहीं था, यह एक क़सम थी-न्याय को दरकिनार करने की, हर क़ानून को तोड़ने की। ईशा ने जवाब दिया, अपनी सारी उदासी, अपराधबोध और अनैतिक इच्छाओं को उस स्पर्श में उड़ेल दिया। यह वह पल था जब संदिग्ध और जासूस का अंतर मिट गया। वे केवल दो भूखी आत्माएँ थीं, जो मौत के साये में जीवन की तलाश कर रही थीं।

अर्जुन ने उसे उठाया, उसके गालों पर गिरे आँसुओं को पोंछा, और फिर उसे दीवार की ओर धकेल दिया। उनकी साँसें एक-दूसरे में घुलमिल गईं। वर्दी और सिल्क का गाउन, कर्तव्य और ख़ुदग़र्ज़ी-सब कुछ उस कमरे की भीषण गर्मी में पिघल रहा था।

“अगर मैं तुम्हें सच बताऊँ,” अर्जुन हाँफते हुए बोला, उसकी आवाज़ अब एक भीगी हुई गुर्राहट थी, “तो मैं तुम्हें पहली नज़र में ही समझ गया था। तुम ख़तरनाक हो। तुम मुझे ख़त्म कर सकती हो।”

“और तुम मुझे,” ईशा ने उसके कंधे को कसकर पकड़ते हुए फुसफुसाया। “अगर तुमने मुझे ख़त्म नहीं किया, तो यह दुनिया कर देगी।”

उस रात, प्यार और मौत ने एक अपवित्र गठबंधन बना लिया। उसने उसे बचाया, और उसने उसे ख़ुद को बर्बाद करने की आज़ादी दी।

तीसरा अध्याय: सच्चाई का दोहरा नक़ाब

अवंतिका की आँखें फिर से मलाबार हिल के पेंटहाउस की मंद रोशनी में खुल गईं। रजत शर्मा उसे घूर रहा था। अवंतिका ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे वह अभी-अभी गहरे पानी से बाहर निकली हो।

“आपने अपनी कहानी का जवाब दे दिया, अवंतिका जी,” रजत ने धीरे से कहा। “समर का अँधेरा वहीं से आता है जहाँ से नैना की भेद्यता आती है। लेकिन… मुझे लगता है कि यह सिर्फ प्रेरणा नहीं है।”

रजत ने अपनी नोटबुक बंद की और उसके ऊपर एक मोटी फ़ाइल रखी। फ़ाइल का कवर पीला पड़ चुका था।

“पांच साल पहले, मुंबई में विक्रम देशमुख की हत्या हुई थी। बहुत हाई-प्रोफ़ाइल केस था। क़ातिल कभी नहीं पकड़ा गया। पुलिस के पास एक प्रमुख संदिग्ध थी-उसकी मंगेतर, ईशा।”

अवंतिका का चेहरा पत्थर जैसा हो गया। उनका वाइन ग्लास उनके हाथ में हिलना बंद हो गया।

“और उस केस का लीड डिटेक्टिव कौन था, अवंतिका जी? इंस्पेक्टर अर्जुन। एक ऐसा अफ़सर जिसका करियर बेदाग़ था, जिसने अचानक इस केस को ठंडे बस्ते में डाल दिया, बिना किसी स्पष्टीकरण के। फाइल क्लोज कर दी गई, बिना न्याय दिए।”

रजत मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में कोई दया नहीं थी। वह अब शिकारी था।

“आपकी किताब ‘खूनी चाँदनी’ में, समर नैना को बचाता है। वह सारे सबूत मिटा देता है। वह जानता है कि वह दोषी है, लेकिन उसका प्यार उसे अंधा कर देता है। अवंतिका जी, ईशा कहाँ है? और अर्जुन कहाँ है? क्या वे दोनों समर और नैना की तरह ही… गुमनाम जीवन जी रहे हैं?”

अवंतिका ने मेज पर झुकीं। उनकी आँखें अब केवल रहस्य नहीं, बल्कि एक स्वीकारोक्ति की कहानी कह रही थीं।

“ईशा,” उन्होंने धीमी, लगभग फुसफुसाहट में कहा, “उसे अपनी कहानी कहनी थी। उसे उस अपराधबोध को बाहर निकालना था। अवंतिका सक्सेना उसकी ढाल है, रजत जी। और हर लेखक अपने जीवन के सत्य को छुपाने के लिए ही कथा का सहारा लेता है।”

“तो आप मानती हैं कि नैना, यानी ईशा, क़ातिल थी?” रजत का स्वर उत्साह से भरा था।

अवंतिका ने आँखें ऊपर उठाईं। उनके चेहरे पर वह संवेदनशीलता लौट आई जो केवल गहरे दर्द से आती है।

“उस रात, विक्रम ने मुझे बताया कि वह मुझे धोखा दे रहा था। उसने मुझे कमज़ोर कहा, बेकार कहा। और मैंने… मैंने उसे ख़त्म कर दिया। यह क्रोध था, हाँ। पर यह आज़ादी की प्यास भी थी। मुझे पता था कि मुझे जेल जाना होगा। मुझे लगा था कि मेरा जीवन ख़त्म हो गया।”

वह रुक गईं। उस पल, वह दुनिया की सबसे ख़तरनाक और सबसे अकेली औरत थीं।

“लेकिन फिर अर्जुन आया। वह जाँच करने आया था। वह सज़ा देने आया था। उसने मेरा झूठ सुना, मेरे आँसू देखे, और जब उसने मेरी आँखों में देखा… उसने सच्चाई देखी। उसने देखा कि मैं सिर्फ एक क़ातिल नहीं थी। मैं एक ऐसी औरत थी जो प्यार और न्याय के बीच फँस गई थी।”

अवंतिका की आवाज़ में अब गर्व था। “उसने सारे सबूत मिटा दिए। हर वह निशान जो मुझे सज़ा दे सकता था। उसने अपना करियर, अपना सम्मान, अपनी आत्मा… सब मेरे लिए दाँव पर लगा दिया।”

“तो वह अब कहाँ है? डिटेक्टिव अर्जुन? क्या वह यहाँ है? क्या आप दोनों अभी भी…”

अवंतिका ने रजत को बीच में ही काट दिया। “समर का अँधेरा यही है, रजत जी। उसने अपराध को स्वीकार किया, न कि उस अपराध के लिए जो मैंने किया, बल्कि उस अपराध के लिए जो उसने प्यार में किया। वह मेरा अपराधबोध नहीं था जो हमें बांधता है; यह उसका त्याग था। एक जासूस का अपनी क़ातिल से प्यार-यही असली ट्विस्ट है।”

समापन: प्यार की सज़ा

अवंतिका की आँखें फिर से चमक उठीं, लेकिन इस बार डर की बजाय एक गहरी, मालिकान संतुष्टि थी।

“और हाँ, रजत जी,” उन्होंने धीरे से कहा, “हम अभी भी साथ हैं। वह मेरा पाठक है, मेरा आलोचक है, और मेरा कैदी है।”

रजत अभी भी सदमे में था। “लेकिन… आपको डर नहीं लगता? क्या वह आपको किसी दिन… धोखा नहीं देगा? क्या उसे अपने कर्तव्य का बोध नहीं होगा?”

अवंतिका हँस पड़ीं। यह हँसी मधुर नहीं थी; यह रेत के कागज़ की तरह खुरदरी थी।

“वह हमें बचाने के लिए सारी हदें पार कर गया है। अब उसका कर्तव्य मैं हूँ। और जहाँ तक धोखे की बात है… वह कभी नहीं होगा। क्योंकि अगर वह कभी मुझे पुलिस को सौंपता है, तो उसे यह भी बताना होगा कि उसने ख़ुद को कैसे तबाह किया। और उस बर्बादी का हर क्षण… हमारे बीच के रिश्ते का आधार है।”

तभी, पेंटहाउस के प्रवेश द्वार पर एक दरवाज़ा खुलने की धीमी, जान-बूझकर धीमी आवाज़ आई।

अवंतिका का ध्यान रजत से हटकर उस दिशा में गया। उनकी आँखें अब सौम्य नहीं थीं; वे एक ऐसी स्त्री की थीं जो जानती है कि उसका शैतान उसे लेने आ गया है।

एक लम्बा, मज़बूत साया कमरे की देहलीज़ पर दिखाई दिया। वर्दी नहीं, बल्कि गहरे रंग का सूट। उसका चेहरा इंटरव्यू की रोशनी से दूर, अँधेरे में था, पर उसकी उपस्थिति कमरे के हर रहस्य को और गहरा कर रही थी।

अवंतिका ने रजत की तरफ़ देखा। “माफ़ करना, रजत जी। मेरा जासूस आ गया है। उसे मेरी हर सच्चाई का पता है, और वह मुझे कभी भी झूठ बोलने नहीं देता।”

अर्जुन (या समर, या जो भी वह अब था) ने एक पल के लिए अवंतिका की ओर देखा। वह नज़र धमकी भरी नहीं थी, बल्कि पूर्ण स्वामित्व वाली थी। उसने सिर हिलाया, मानो कह रहा हो, ‘चलो, अब बहुत देर हो चुकी है।’

अवंतिका उठीं। उनकी चाल में फिर से वही मोहक, ख़तरनाक आत्मविश्वास था। वह दरवाज़े की ओर बढ़ीं, जहाँ उसका जासूस उसका इंतज़ार कर रहा था।

“आपकी किताब का शीर्षक ‘खूनी चाँदनी’,” रजत ने लगभग कानाफूसी में कहा, “इसका क्या मतलब है?”

अवंतिका, दरवाज़े पर रुक गईं। “चाँदनी हमेशा ख़ूबसूरत होती है, रजत जी। पर जब वह किसी के ख़ून से रंग जाती है, तो वह और भी ज़्यादा मादक हो जाती है। क्योंकि जो प्यार अपराध के ऊपर जन्म लेता है, वह सबसे गहरा और सबसे अमर होता है।”

वह उसके पास चली गई। अर्जुन ने उसके कंधों पर हाथ रखा। उसका स्पर्श सुरक्षात्मक नहीं था, बल्कि एक क़ैद की मुहर था। वह उस महिला को बचाए रखने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा चुका था। उसका जीवन अब हमेशा के लिए उस अपराध से जुड़ा रहेगा, जिसे उसने दफ़न कर दिया था। उनका प्यार, उनकी सबसे बड़ी सज़ा थी।

जैसे ही वे दोनों अँधेरे में ग़ायब हुए, रजत शर्मा ने रिकॉर्डर बंद किया। उसे पता था कि उसे अपनी पत्रिका के लिए वह एक्सक्लूसिव कहानी मिल गई है, पर उसे यह भी पता था कि उसने अभी-अभी एक क़ातिल और उसके रक्षक को देखा है, जो हमेशा के लिए प्यार और झूठ के जाल में फँसे हुए हैं। उसने ख़ुद से पूछा, “इस कहानी में असली क़ातिल कौन है?” और जवाब था: “प्यार।”

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