क्या आपका घर आपको देखता है?

क्या आप जानते हैं कि एक घर आपको सिर्फ़ आश्रय नहीं देता-वह आपको देखता है, साँस लेता है, और कभी-कभी तो वह आपके साथ बातें भी करता है, पर उस भाषा में जिसे आप समझना नहीं चाहते।

मुझे, एक लेखक के तौर पर, अक्सर ऐसे पत्र मिलते हैं जिनमें लोग उन अनजानी चीज़ों का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महसूस की हैं। ये कोई डरावनी फ़िल्मों के वीभत्स भूत नहीं होते-ये वो काली परछाइयाँ हैं, वो अजीबोग़रीब फुसफुसाहटें हैं, और वो अचानक आती ठंडक है जो आपको बताती है कि आप इस जगह पर अकेले नहीं हैं। लेकिन सबसे डरावनी कहानियाँ वे होती हैं जहाँ लोग कहते हैं कि उन्होंने उन सायों के साथ जीना सीख लिया था- जैसे, “मैं एक ऐसे घर में पला-बढ़ा जहाँ भूत रहते थे,” या “जब सीढ़ियों पर वो घिसटने की आवाज़ आती थी, तो हम जानते थे कि अब सोने का समय हो गया है।” यह सामान्यीकरण, यह उस असहजता को स्वीकार कर लेना ही तो असली डर है। क्योंकि जब आप ख़ौफ़ के आदी हो जाते हैं, तो आप उसे हराने की कोशिश करना बंद कर देते हैं।

और ये कहानियाँ महज़ कल्पना नहीं हैं। ये उन अनुभवों का लेखा-जोखा हैं जो हज़ारों लोगों ने, दुनिया के अलग-अलग कोनों में, बिल्कुल अलग-अलग परिस्थितियों में महसूस किए हैं।

पहला अध्याय: अदृश्य सहयात्री (The Invisible Roommate)

मैंने इस तरह की कितनी ही कहानियाँ पढ़ी हैं, पर इस विषय पर मेरे विचार हमेशा साफ़ रहे हैं: सबसे ज़्यादा डर आपको तब लगता है जब ‘कुछ नहीं होता’। जब कोई चीज़ आपको दिखती नहीं, लेकिन उसकी उपस्थिति आपकी रीढ़ को जमा देती है।

जैसे, एक परिवार जिसने अपने घर की दूसरी मंज़िल को ‘बंद’ कर दिया था। उनका दावा था कि घर पुराना नहीं था, बल्कि वो उन्होंने नया बनवाया था, फिर भी ऊपर से रात को लगातार पत्थर घसीटने की आवाज़ें आती थीं। ये आवाज़ें इतनी नियमित थीं कि परिवार ने पहली मंज़िल पर सोने की आदत डाल ली थी, और दूसरी मंज़िल उनके लिए एक तरह का ‘बफ़र ज़ोन’ बन गई थी, जहाँ से डर की दस्तक आती थी। अजीब बात यह थी कि जब उन्होंने पंडितों को बुलाया, तो उन्होंने कहा कि वहाँ कुछ भी नहीं है, पर परिवार की बेटी, जो महज़ सात साल की थी, हमेशा दीवार से सटकर चलती थी और कहती थी, “वह दीवार के अंदर खड़े रहते हैं।”

दरवाज़े का अपने आप खुल जाना या चीज़ों का अपनी जगह से हट जाना-यह तो बहुत आम है। यह उन कहानियों का एक हिस्सा है जो हमें बताती हैं कि ये ऊर्जाएँ हमसे ‘खेल रही हैं’। लेकिन कभी-कभी ये खेल ज़्यादा व्यक्तिगत हो जाते हैं। एक महिला ने बताया कि वह अक्सर किचन में काम कर रही होती थी और उसे लगता था कि कोई उसके बालों को सहला रहा है। यह स्पर्श बहुत ठंडा और गीला होता था। उसने शुरू में सोचा कि यह शायद उसके बेटे का मज़ाक होगा, पर एक दिन उसने मुड़कर देखा और वहाँ कोई नहीं था। तब उसने महसूस किया कि वह ठंडापन केवल उसके सिर पर नहीं, बल्कि उसके अंदर तक उतर गया था। इस तरह की चीज़ें आपको मानसिक रूप से तोड़ देती हैं। आप अपनी ही वास्तविकता पर शक करने लगते हैं। आई मीन, यह कितना ख़ौफ़नाक है कि आपको पता चले कि कोई आपको छू रहा है, और वह कोई इंसान नहीं है-वह शायद सदियों पुराना कोई साया है।

दूसरा अध्याय: शीतलता का हमला (The Assault of Coldness)

सबसे विश्वसनीय और डरावनी कहानियाँ वे होती हैं जिनमें दावा करने वाले व्यक्ति ने कुछ देखा नहीं होता, सिर्फ़ महसूस किया होता है।

मुझे याद है एक व्यक्ति की कहानी जिसने एक पुराने बंगले में किराये पर रहना शुरू किया था। वहाँ सब कुछ सामान्य था, सिवाय बेसमेंट के पास वाले गलियारे के। उस गलियारे में, चाहे जून की तपती गर्मी हो, तापमान अचानक -10 डिग्री तक गिर जाता था। यह कोई ड्राफ़्ट नहीं था, कोई टूटी खिड़की नहीं थी-यह अचानक आने वाली, हड्डियों को गला देने वाली, बर्फ़ जैसी ठंड थी। उस आदमी ने बताया कि वह जब भी उस गलियारे से गुज़रता था, उसके हाथ के रोंगटे खड़े हो जाते थे, और उसे लगता था कि उसकी साँसें जम गई हैं। सबसे डरने वाली बात यह थी कि उसके कुत्ते ने कभी भी उस गलियारे को पार करने की हिम्मत नहीं की। कुत्ता वहाँ जाकर केवल घूरता था, उसकी पूँछ नीचे हो जाती थी, और वह हल्का-सा गुर्राता था। जानवरों की छठी इंद्री हमेशा हमें सचेत करती है, पर हम इंसानों को लगता है कि हम ज़्यादा समझदार हैं। Actually, come to think of it, जानवर हमें उस खतरे से बचाते हैं जिसे हमारी आँखें नहीं देख सकतीं।

इस ठंडक का संबंध अक्सर तीव्र भावनात्मक ऊर्जा से होता है। कुछ पारलौकिक जानकार मानते हैं कि जब कोई आत्मा किसी जगह से ऊर्जा चूसती है, तो वह अपने आस-पास की हवा को जमा देती है। यह तर्क शायद वैज्ञानिक न हो, पर जो लोग इसे अनुभव करते हैं, उनके लिए यह परम सत्य होता है।

अब, इन सभी कहानियों में एक पैटर्न है। घर में अजीब सी घबरहाट (यहाँ मैं जानबूझकर एक छोटी सी ग़लती कर रहा हूँ, क्योंकि लिखने की रफ़्तार में ऐसा होता है) हमेशा एक ही समय पर शुरू नहीं होती। अक्सर यह किसी ‘ट्रिगर’ के बाद शुरू होती है। शायद आपने उस घर में कोई नई चीज़ लाई हो, या किसी पुरानी दीवार को तोड़ा हो। जैसे कि एक घटना जो कैलिफ़ोर्निया के एक छोटे शहर से आई थी। एक परिवार ने एक पुराने कवर्ड (almari) को फेंक दिया था। अगले ही दिन से, रात को ठीक 3 बजे उनके बेडरूम का दरवाज़ा तीन बार ठक-ठकाता था, और फिर एक बच्चे के रोने की बहुत धीमी आवाज़ आती थी। जब उन्होंने पड़ोसियों से पूछा, तो पता चला कि पिछले मालिक ने उसी कवर्ड में एक पालतू बिल्ली को बंद करके मार दिया था-और बिल्ली का बच्चा नहीं था!

परेशानी की बात यह थी कि जब उन्होंने वापस उस कवर्ड को खोजने की कोशिश की, तो वह कबाड़ में मिल ही नहीं पाया। वह कवर्ड, their (यहाँ अंग्रेज़ी का इस्तेमाल कर रहा हूँ) डर का स्रोत, बस ग़ायब हो गया था। यह इस बात को सिद्ध करता है कि आत्माएँ चीज़ों से नहीं जुड़ी होतीं, वे उस घटना से जुड़ी होती हैं जिसने उन्हें उस जगह पर बांध दिया है।

तीसरा अध्याय: सामान्य हो चुका डर (The Normalized Terror)

वह भय जो हमें सबसे ज़्यादा हैरान करता है, वह नहीं है जिसे हम अचानक अनुभव करते हैं, बल्कि वह है जिसके साथ हम बड़े होते हैं।

एक महिला ने बताया कि उसका बचपन एक ऐसे घर में बीता था जहाँ ऊपर के हॉल में हमेशा एक गेंदनुमा काली चीज़ घूमती रहती थी। वह कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाती थी, बस दिखती थी। उनके माता-पिता ने शुरू में पागलों की तरह भाग-दौड़ की, घर बदलने की कोशिश की, पर जब कोई हल नहीं निकला, तो उन्होंने इसे परिवार का एक हिस्सा मान लिया। जब भी कोई नया मेहमान आता और पूछता, “यह क्या है?” तो परिवार के सदस्य बड़े आराम से जवाब देते, “अरे, यह तो बस ‘गोला’ है। यह कुछ नहीं करता, बस रात को घूमता है।”

ज़रा सोचिए। बचपन से लेकर युवावस्था तक आप एक साये के साथ रहते हैं जिसे आप जानते हैं कि वह असली नहीं है, पर वह है। यह किसी भी इंसान के मानस पर क्या असर डालता होगा? क्या हम उन बच्चों को दोष दे सकते हैं जिन्होंने उस ‘गोले’ को देखकर भी अपनी आँखें बंद कर लीं और कहा कि यह सब सामान्य है? मुझे लगता है कि यह आत्मरक्षा का सबसे अजीब तरीक़ा है-आप डर से इतना थक जाते हैं कि आप उसे ‘वॉलपेपर’ मान लेते हैं।

और यह केवल भारत की बात नहीं है। पश्चिमी देशों में भी, जहाँ लोग भूतों पर विश्वास करने का दिखावा नहीं करते, वहाँ भी ऐसी कहानियाँ हैं। एक व्यक्ति ने लिखा कि उसके दादा-दादी के घर में, रात को 11 बजे, डाइनिंग रूम की लाइट हमेशा जल जाती थी और फिर बंद हो जाती थी। यह प्रक्रिया 20 सालों तक चली। दादाजी ने कभी उसे ठीक कराने की कोशिश नहीं की। जब उस व्यक्ति ने पूछा, तो दादाजी ने कहा, “यह सिर्फ़ बिजली की गड़बड़ी नहीं है, बेटा। यह सिर्फ़ ‘वह’ है जो रात को चेक करने आता है कि सब सो गए हैं या नहीं।” यह कितनी अजीब और शांत स्वीकृति है!

Wait, let me backtrack. दादाजी ने इस घटना को एक रूटीन बना दिया। ठीक वैसे ही जैसे आप दरवाज़ा बंद करना या गैस बंद करना याद रखते हैं, वैसे ही उन्होंने ‘भूत’ के स्विच ऑन/ऑफ़ करने के तरीक़े को स्वीकार कर लिया। यह वह बिंदु है जहाँ डर एक किंवदंती बन जाता है, और फिर वह किंवदंती घर का नियम बन जाती है।

चौथा अध्याय: क्यों ये साये हमें छोड़ते नहीं?

मेरा मानना है कि जिन घरों में लंबे समय तक पारलौकिक गतिविधि रहती है, वे वास्तव में ‘हांटेड’ नहीं होते-वे बस ‘टूट’ जाते हैं।

टूटे हुए, यानी जहाँ समय की दीवारें पतली हो गई हैं। वे स्थान जहाँ किसी तीव्र भावना ने एक निशान छोड़ दिया है-जैसे किसी की अचानक मृत्यु, या गहरा दुख, या अनसुलझा क्रोध। ये कहानियाँ जो हमने पढ़ीं-फुटपाथ पर घिसटती चीज़ें, बालों को सहलाना, अचानक ठंडक- ये सब इस बात के संकेत हैं कि वहाँ कुछ है जो भौतिक दुनिया के नियमों का पालन नहीं कर रहा है। और ये चीज़ें अक्सर कमरों के कोनों में या गलियारों के बीच में रहती हैं। ये ज़्यादातर दिखती भी नहीं हैं।

कई बार लोग दावा करते हैं कि उन्होंने अलमारियाँ खुद-ब-खुद हिलते हुए देखी हैं, या किताबों को हवा में तैरते हुए। लेकिन मैं मानता हूँ कि सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली घटना वह होती है जब कोई साया आपसे बोलता है। एक केस में एक महिला ने दावा किया कि उसने अपने घर के आईने में अपने पति की परछाई देखी, जबकि वह काम पर गए हुए थे। उस परछाई ने धीरे से कहा, “तुम अकेली हो।” यह केवल डरावना नहीं है-यह व्यक्तिगत और दर्दनाक है। यह आपकी असुरक्षाओं पर हमला करता है।

सो, जब कोई कहता है कि वह हांटेड हाउस में पला-बढ़ा है, तो वह वास्तव में यह कह रहा होता है कि उसने बचपन से ही इस दुनिया के ‘असामान्य’ नियमों को समझा है। उन्हें पता होता है कि किस कमरे में नहीं जाना है, किस समय उठना नहीं है, और किस परछाई को अनदेखा कर देना है। उन्हें लगता है कि वे सुरक्षित हैं क्योंकि वे सायों को पहचानते हैं।

पर क्या वास्तव में कोई इंसान ख़ौफ़ के बीच सुरक्षित हो सकता है?

और अगर वे साये इतने सालों से आपके साथ रह रहे हैं-तो क्या वे अब आपका इंतज़ार नहीं कर रहे होंगे?

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