इत्र, स्याही और सदियों की घुटन

हवेली के तहख़ाने में हवा नहीं थी, बस सदियों की घुटन थी-ऐसी घुटन जो सिर्फ़ पुरानी दीवारों, सूखे गुलाबों और उन राज़ों के माथे से रिसती है जिन्हें रौशनी नसीब न हुई हो. रुद्रा का कुर्ता पीठ पर पसीने से चिपका था, और धूल की एक मोटी परत उसके फेफड़ों में इतिहास के ज़र्द पत्तों सा स्वाद भर रही थी. यह सिर्फ़ धूल नहीं थी, यह ख़ामोशी थी. एक ऐसी ख़ामोशी जिसके पीछे शहंशाहों की साज़िशें और सायरन की चीख़ें दबी थीं.

उसकी उँगलियाँ पत्थर की मेहराबों पर टटोल रही थीं. उम्मीद, जो सुबह दिल्ली की भाग-दौड़ वाली सड़कों पर दम तोड़ चुकी थी, अब इस अँधेरे कोने में एक थरथराती मोमबत्ती की लौ की तरह फिर से जगमगा उठी थी. तीन दिन की तलाश. तीन दिन की भूक और प्यास, सिर्फ़ उस एक चीज़ के लिए जो शायद उसके वजूद को मटियामेट कर दे. वह जानता था कि इस तहख़ाने में रखी चीज़ की कीमत अरबों में नहीं थी, बल्कि इसकी कीमत थी हिंदुस्तान की उस ‘सही’ तारीख़ को ध्वस्त कर देने में, जिसे हमने किताबों में पढ़ा था.

तभी उसकी उंगलियों ने कुछ महसूस किया. लकड़ी नहीं. पत्थर नहीं. कुछ ऐसा, जो छूने में रेशम जैसा कठोर था-जैसे किसी जानवर की मोटी चमड़ी, जिसे सदियों पहले बेहद कारीगरी से मोड़ा गया हो.

रुद्रा ने मोमबत्ती ज़मीन पर रखी. साँस अंदर खींची, और कोने में धँसी हुई संदूकची को बाहर खींच लिया. उस पर मोटी ज़ंग की परतों के नीचे पीतल की नक़्क़ाशी थी, जिस पर किसी मयख़ाने की नहीं, बल्कि किसी शमशान की मुहर लगी थी. जब उसने कसे हुए ताले को अपनी जाली चाबी से खोलने की कोशिश की, तो ताला चीख़ा नहीं, बल्कि एक दबी हुई आह भर कर टूट गया. जैसे कोई पुराना कैदी आज़ाद हुआ हो, या शायद फिर से क़ैद कर लिया गया हो.

संदूकची के अंदर अँधेरा था. सिर्फ़ अँधेरा. और उस अँधेरे के ठीक बीच में एक चीज़ रखी थी-काले रंग की. इतनी काली कि वह मोमबत्ती की रौशनी भी सोख रही थी. उसकी जल्ड पर कोई नक़्क़ाशी नहीं थी, कोई सोना-चाँदी नहीं था. बस शुद्ध, घनी स्याही जैसी कालाहट. वह किताब नहीं थी. वह थी-‘शहंशाह के ऐश की स्याह पोथी’.

उसका हाथ थरथराया. उसकी साँस गले में आटकी थी. यह वही चीज़ थी, जिसके लिए इतिहास के कई पन्ने जलाए गए थे, कई सिर कलम हुए थे. यह सिर्फ़ एक बही-खाता नहीं था, यह उस शहंशाह के रात के परदे के पीछे की डायरी थी-उन ऐशगाहों का लेखा-जोखा जहाँ रियासत का ख़ज़ाना पानी की तरह बहाया जाता था, और बेक़सूरियों की आबरू राख की तरह उड़ाई जाती थी.

पहला पन्ना: गुलाब और लहू

रुद्रा ने पोथी को सीने से लगाया. उसकी चमड़ी से एक अजीब, ठंडी खुशबू आ रही थी-चंदन और ज़हर का मिश्रण. वह इसे तहख़ाने से बाहर नहीं निकाल सकता था. डर था कि ऊपर बैठी हवेली की पुरानी मालकिन, बेगम ज़ैदा, शायद अभी भी जाग रही हो. ज़ैदा बेगम जो अपनी सौ साल पुरानी आँखों से इतिहास को ढकने का काम करती थीं. रुद्रा वहीं ज़मीन पर बैठ गया, अँधेरे और घुटन के बीच, पोथी को खोलने के लिए तैयार.

पोथी का वज़न एक जीवित प्राणी जितना था. पहला पन्ना, जिसे उसने मुश्किल से पलटा, वह कागज़ का नहीं, बल्कि महीन, पीले पड़ चुके चर्मपत्र का था. स्याही इतनी गहरी थी कि आज भी चमक रही थी, जैसे अभी-अभी क़लम ने उसे छुआ हो. फ़ारसी लिपि, शिकस्ता शैली में लिखी हुई, जिसे पढ़ना आम आदमी के बस की बात नहीं थी.

रुद्रा ने धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया. उसकी विशेषज्ञता इसी स्याही, इसी दर्द में थी.

“तारीख़: 15वीं रबी-उल-अव्वल. आज रात, चांदनी ज़ादा थी. इत्र और ख़स की खुशबू में डूबी ‘नूर परी’ को पेश किया गया. उसने अपनी आँखों से नहीं, अपनी धड़कन से बात की. ऐशखाना तैयार था. हुज़ूर ने हुक्म दिया कि आज की रात सल्तनत का कोई भी सिपाही न जागे. सिर्फ़ शहंशाह और नूर परी का साया महफ़िल में होगा.”

रुद्रा की धड़कन बढ़ गई. नूर परी! इतिहास की किताबों में इसका ज़िक्र सिर्फ़ एक मामूली तवायफ़ के रूप में था, जिसे अचानक रात के अँधेरे में गायब कर दिया गया था. लेकिन यह पोथी कुछ और बता रही थी. यह सिर्फ़ ऐश का वर्णन नहीं था; यह एक रिकॉर्ड था-कितना सोना ख़र्च हुआ, किस दरबारी ने इस ख़ास मुलाकात का इंतज़ाम किया, और सबसे ज़रूरी, ‘ऐश’ की परिभाषा क्या थी.

जैसे-जैसे रुद्रा पन्ने पलटता गया, कमरा छोटा होता गया. उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें सिकुड़ रही हैं और हवा में इत्र और ख़ून की मिली-जुली गंध भर गई है. यह कोई कल्पना नहीं थी. यह पोथी इतिहास के सड़े हुए ज़ख्मों को फिर से खोल रही थी. इसमें उन राजकुमारों के नाम थे जिन्हें ज़हर दिया गया था, उन बेगमों के नाम थे जिन्हें शाही हवस शांत करने के लिए महलों के अँधेरे कोनों में दफ़न कर दिया गया था.

एक और पन्ना. यहाँ शहंशाह की अपनी लिखावट थी-तेज़, क्रूर और बेपरवाह.

“मुझे रियासतें नहीं चाहिए, मुझे रात चाहिए. रात का साया. जब शहर सोता है, और क़ानून भी. आज रात मदिरा और संगीत की कोई कमी न थी. मेरी नई ‘ख़ुशबू’ को कल अफ़ग़ानिस्तान से लाया गया है. उसकी सादगी उसकी ताक़त है. मैंने उसे अपने बाग़ के सबसे दुर्लभ गुलाब दिए-और फिर बाग़ के सारे गुलाब जला दिए, ताकि वह समझ जाए कि अब सिर्फ़ वही ‘ख़ुशबू’ मेरी है.”

रुद्रा ने माथा मलता. यह सिर्फ़ ऐश नहीं था, यह वह सत्ता थी जो किसी भी मानव मूल्य को कुचल सकती थी. शहंशाह के ऐश की स्याह पोथी-यह सिर्फ़ एक रिकॉर्ड नहीं था, यह उस समय के सत्ता के चरित्र का आईना था.

तहख़ाने की साज़िश

समय कितना बीता, रुद्रा को ख़याल नहीं रहा. मोमबत्ती लगभग पिघल चुकी थी, उसका तेल ज़मीन पर जम रहा था. जब वह एक बहुत ही निजी और दर्दनाक एंट्री पढ़ रहा था-एक एंट्री जिसमें शहंशाह ने अपने सबसे वफ़ादार वज़ीर की बेटी को सिर्फ़ इसलिए उठा लिया था क्योंकि वज़ीर ने किसी राजनीतिक फ़ैसले पर असहमति जताई थी-तभी एक आहट हुई.

सावधान! यह तहख़ाना हवेली से बिल्कुल कटा हुआ था. यहाँ कोई आहट नहीं होनी चाहिए थी. रुद्रा ने पोथी तुरंत बंद की और संदूकची के बगल में दुबक गया.

आहट ज़मीन के ऊपर से आ रही थी-पुरानी लकड़ी के फ़र्श पर नंगे पैरों की आवाज़. दबी हुई, एहतियाती चाल. बेगम ज़ैदा शायद सोई नहीं थीं. क्या उन्हें पता चल गया था कि रुद्रा अपनी तयशुदा ‘ज़्यादा पुरानी किताबें’ तलाश करने के बजाय, इस प्रतिबंधित पोथी तक पहुँच गया है?

रुद्रा की साँस तेज़ हो गई, लेकिन उसने उसे दबा लिया. उस तहख़ाने की हवा, जो पहले सिर्फ़ बासी थी, अब ख़तरे से भरी हुई थी. उसने आँखें बंद कीं और अपनी धड़कन को सुनने की कोशिश की. धक. धक. धक. यह उसकी धड़कन थी, या शहंशाह के दफ़न राज़ों की?

ऊपर आवाज़ रुकी. ठीक उसके ऊपर, जहाँ तहख़ाने का छोटा सा गुप्त दरवाज़ा था. फिर, एक और आवाज़ आई-धीरे से ‘शहंशाह के ऐश की स्याह पोथी’ का नाम फुसफुसाया गया. यह बेगम ज़ैदा की आवाज़ नहीं थी. यह ज़्यादा कठोर थी, ज़्यादा युवा, और निश्चित रूप से, ज़्यादा ख़तरनाक.

रुद्रा ने महसूस किया कि यह इतिहास सिर्फ़ अतीत नहीं है. यह अभी भी ज़िंदा है, और जो लोग इसे दबाना चाहते हैं, वे अभी भी सक्रिय हैं.

दरवाज़ा खुलने की हल्की सी चरमराहट हुई. तेल की एक बूँद टपकी. रुद्रा ने अपनी आँखें खोलीं. रौशनी का एक पतला, ख़तरनाक फ़ीता तहख़ाने के फ़र्श पर गिरा. एक साया, लंबा और पतला, सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा.

रुद्रा के दिमाग़ में तेज़ी से इतिहास के पन्ने घूमने लगे. शहंशाह ने इस पोथी को क्यों नहीं जलाया था? क्यों इसे इतना गुप्त रखा गया था? क्योंकि यह सिर्फ़ ऐश का ब्योरा नहीं था, यह एक ब्लैक मेलिंग टूल था. इस पोथी में कई वर्तमान राजनीतिक घरानों के पूर्वजों के घिनौने राज़ दर्ज थे-कि कैसे उन्होंने अपनी बहनें, अपनी ज़मीनें, या अपनी आत्माएँ शहंशाह के ऐश के लिए बेच दी थीं.

वह साया नीचे आया और रुक गया. उसने रुद्रा को नहीं देखा था. उसकी नज़र सीधे संदूकची पर थी, जो रुद्रा के पीछे, आधी खुली पड़ी थी.

“मुझे पता था कि बूढ़ी औरत इसे नष्ट नहीं करेगी,” उस आवाज़ ने फुसफुसाया. वह आवाज़ साफ़ हिंदी में थी, लेकिन उसमें एक तीखी, आधुनिक सत्ता की अहंकार भरी खनक थी.

रुद्रा ने अपनी बगल में पड़ी पुरानी, टूटी हुई लालटेन उठा ली. उसने सोचा: अगर मुझे इस पोथी को दुनिया के सामने लाना है, तो मुझे इतिहास की तरह ही क्रूर होना पड़ेगा.

वह साया संदूकची की ओर बढ़ा. रुद्रा के पास सिर्फ़ एक पल था. उस एक पल में, उसने अपने अंदर सदियों का ग़ुस्सा, नूर परी का दर्द, और बेगम ज़ैदा की चुप्पी भर ली.

जैसे ही उस शख़्स ने पोथी की तलाश में हाथ बढ़ाया, रुद्रा बिजली की तेज़ी से उठा और लालटेन उसके सिर पर दे मारी. तेल ज़मीन पर बिखरा. कांच टूटा. साया ज़ोर से चीख़ा, लेकिन रुद्रा ने चीख़ने का मौक़ा नहीं दिया. उसने अपनी पूरी ताक़त से उस शख़्स को ज़मीन पर धकेल दिया.

तहख़ाने में पूर्ण अँधेरा छा गया. सिर्फ़ रुद्रा की तेज़ साँसें और उस शख़्स की दबी हुई आहें थीं.

अंतिम फ़ैसला: उजाले का ख़तरा

रुद्रा ने टटोलकर उस शख़्स के हाथ से कुछ गिरा हुआ महसूस किया-एक आधुनिक पिस्तौल. शहंशाह के ऐशगाह की निगरानी अब स्वचालित हथियारों से हो रही थी.

उसने पोथी को अपने कुर्ते के अंदर कसकर छिपा लिया. वह जानता था कि अब हवेली में रुकना मौत को दावत देना है. ऊपर से कोई और भी आ सकता था. यह सिर्फ़ एक गुंडा नहीं था; यह किसी बड़ी साज़िश का मोहरा था.

वह अंधेरे में रेंगता हुआ तहख़ाने के मुख्य दरवाज़े की ओर भागा. दरवाज़ा ज़ंग खाया हुआ था, लेकिन उसे खोलना ज़रूरी था.

जैसे ही वह दरवाज़े के पास पहुँचा, उसे पीछे से ज़मीन पर रेंगते हुए उस शख़्स की आवाज़ आई, “तुम इसे नहीं ले जा सकते! यह राज़ हमेशा दफ़न रहेगा. यह हमारे परिवार की इज़्ज़त है!”

परिवार? रुद्रा को तुरंत समझ आ गया. यह शख़्स उन दरबारी वंशजों में से एक था, जिनके पूर्वजों का ज़िक्र ‘शहंशाह के ऐश की स्याह पोथी’ में शर्मनाक तरीक़े से दर्ज था. वे आज भी सत्ता में थे, और इस इतिहास को मिटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे.

रुद्रा ने दरवाज़ा खोला. बाहर, रात की ठंडी हवा का एक झोंका उसे छूकर गुज़रा. अँधेरे से भरी हुई, इत्र की गंध से लथपथ उस पोथी को सीने से लगाए, रुद्रा ने हवेली के टूटे हुए फाटक की ओर दौड़ लगा दी. उसकी पीठ पर अब सिर्फ़ पसीना नहीं, बल्कि इतिहास का भार था.

वह शहर की ओर भागा, जहाँ नई सुबह की पहली रौशनी बादलों के पीछे से झाँक रही थी. वह जानता था कि ‘स्याह पोथी’ को प्रकाशित करना ख़ुद को ख़तरे में डालना है. लेकिन अब यह सिर्फ़ इतिहास की किताब नहीं थी; यह इंसाफ़ का पहला क़दम था.

और जब उसने हवेली के बाहर निकलते हुए पीछे मुड़कर देखा, तो उसने महसूस किया कि शहंशाह का ऐश आज भी ज़िंदा है-सिर्फ़ तहख़ानों में नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीति की नसों में भी.

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