Killers and love stories

पाँचवी रात का इंतकाम: लहू और लिबास की दास्तान

बारिश की आवाज़… हमेशा वही. जब भी वह आवाज़ गूँजती है, मुझे उसकी सिंदूरी साड़ी और बेख़ौफ़ आँखों की याद आती है. दरवाज़े पर दस्तक हुई, ‘जासूस’ अंदर आया. उसने मेरी ओर देखा, उसकी नज़रों में सवाल नहीं, सिर्फ़ ज़लालत थी. वह जानता था कि मैं अपराधी हूँ. मैं जानता था कि वह नहीं जानता कि मैं किस अपराध के लिए मर रहा हूँ.

“रुद्र जी,” जासूस ने कहा, उसकी आवाज़ सूखी और रूखी थी, “हमें बस एक और बार उस रात की कहानी सुननी है. आराध्या की लाश आपको कहाँ मिली थी?”

मैंने बंद आँखें खोलीं. यह सवाल नहीं था, यह मेरी आत्मा पर खींची गई पांचवी लकीर थी. पाँच लकीरें, जो पाँच रातें थीं, और हर रात में एक ज़हर घुला हुआ था. मेरी कहानी, मेरी आराध्या, मेरी सबसे खूबसूरत, सबसे ख़तरनाक भूल.

“कमरे में,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ गहरी और स्थिर थी. “बेड पर, जहाँ हमने पहली बार एक-दूसरे को ‘हमेशा’ का वादा दिया था.”

पहली रात: जब रूह से रूह का मिलना हुआ

अगर इश्क़ की कोई परिभाषा होती, तो वह आराध्या थी. पहली बार जब मैंने उसे देखा, वह मेरे लिखे उपन्यास के एक पन्ने की तरह थी-अधूरी, पर असीम रूप से मोहक. हमने जल्दी की, बहुत जल्दी. शादी के बाद हमारी पहली रात शिमला के उसी पुराने कॉटेज में बीती, जहाँ की चीड़ की खुशबू आज भी मेरी साँसों में बसी है.

उस रात, वह सिर्फ़ मेरी थी. उसके जिस्म की हर कशिश, उसकी आँखों की वो ज्वाला, सब मेरे लिए थी. जब उसने अपने ब्लाउज़ की डोर खोली, तो सिर्फ़ एक आवाज़ आई- रेशम के फिसलने की. उसकी त्वचा, चंद्रमा की रोशनी में, दूधिया और उत्तेजक थी. मैंने पहली बार जाना कि वासना केवल शरीर की भूख नहीं होती, यह आत्मा का समर्पण होती है.

“रुद्र,” उसने फुसफुसाया था, जब मेरे होंठ उसकी गर्दन की धड़कन पर रुके थे. उसकी आवाज़ में वो नशा था, जिसे मैंने अपनी कविताओं में कभी बयाँ नहीं किया था. मैंने उसके शरीर पर अपने नाम की मुहर लगाई थी, हर स्पर्श में एक वादा था कि हम कभी नहीं टूटेंगे. जब सूरज निकला, हम थके हुए नहीं थे, बल्कि नए सिरे से जन्मे थे. यह वह ‘रुहानियत’ थी, जिसने मुझे बाद में तबाह कर दिया.

दूसरी रात: जब दरारें दिखने लगीं

इश्क़ जब जुनून बन जाता है, तो वह ख़तरा पैदा करता है. हमारे रिश्ते में दरारें तब आईं, जब मेरा ध्यान मेरे लेखन की ओर ज़्यादा गया. मेरे शब्द उसकी ज़ुल्फ़ों से ज़्यादा ज़रूरी हो गए. आराध्या, जिसे हर पल मेरी ज़रूरत थी, उसने पहली बार किसी और में सांत्वना खोजी.

वह शख़्स, विक्रम. मेरा पब्लिशर, जो हमेशा मेरे क़रीब रहा, और जिसे मेरी आराध्या की ख़ूबसूरती की लत लग गई थी. मुझे शक हुआ, वह अजीब सी चुप्पी, वह देर रात तक फ़ोन पर बात करना. पर मैंने नज़रंदाज़ किया. मैंने ख़ुद से कहा, ‘वह मेरी है. हमेशा मेरी रहेगी.’

एक रात, जब वह स्टूडियो पार्टी से लौटी, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी-असंतोष की. हमने फिर से प्यार किया, पर इस बार वह समर्पण नहीं था. वह बस एक शारीरिक क्रिया थी, जिसके ज़रिए वह मुझे साबित करना चाहती थी कि वह अब भी मेरी है. मैंने उसके जिस्म पर एक अलग इत्र की ख़ुशबू महसूस की. ख़ूबसूरत, पर अजनबी. मैंने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया, इतनी ज़ोर से कि वह कराह उठी.

“क्या हुआ, रुद्र?” उसने पूछा था.

“कुछ नहीं,” मैंने उसके कान में साँस छोड़ी थी, “बस, यह याद दिला रहा हूँ कि यह जिस्म, यह साँसें, यह दिल… सब मेरा है.”

उसकी आँखें नम हो गईं. वह झूठ नहीं बोल रही थी. वह मर रही थी, मेरे और विक्रम के बीच फँसकर. और मैं, मैं अपने शक के अँधेरे में उसे और धकेल रहा था.

तीसरी रात: शक का साया और ज़हर का चुम्बन

जासूस ने अपनी कुर्सी आगे सरकाई. “उस रात क्या हुआ था, जब आप दोनों के बीच आखिरी बार झगड़ा हुआ?”

“झगड़ा नहीं,” मैंने सुधारा, “बातचीत. एक शांत, ज़हरीली बातचीत.”

वह तीसरी रात, मैं पूरी तरह टूट चुका था. मेरे पास सबूत था-एक छोटा सा लॉकेट, जो मैंने विक्रम के कोट में पाया था, जिस पर A और V खुदा था. मैंने लॉकेट अपनी हथेली में भींच लिया था, जिससे मेरी चमड़ी कट गई. उस रात, जब मैं बेडरूम में गया, आराध्या नग्न बैठी थी, बस एक शीयर शॉल ओढ़े. वह जानती थी कि मैं सब जानता हूँ.

“मैं तुम्हें प्यार करती हूँ,” उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी.

“प्यार?” मैं हँसा, एक डरावनी, खोखली हँसी. मैंने उसके चेहरे पर थूक दिया होता, पर मैं उसे छूना चाहता था, उसे नष्ट करना चाहता था.

मैंने उस लॉकेट को ज़मीन पर फेंक दिया. “विक्रम की खुशबू अब भी तुम्हारे बालों में है, आराध्या. क्या उसने भी तुम्हें ऐसे ही छुआ था?”

वह उठ खड़ी हुई. उसकी नग्नता अब मेरे लिए मोहक नहीं, बल्कि अपमानजनक थी. उसने मेरे क़रीब आकर मेरा चेहरा अपने हाथों में ले लिया. उसके होंठ मेरे होंठों से टकराए. वह चुम्बन, प्रेम का नहीं था, वह एक ज़हर का चुम्बन था. उसने मुझे वापस अपने वश में करने की आख़िरी कोशिश की.

हमारे शरीर फिर मिले, एक हिंसक, बेदर्द मिलन. मेरा स्पर्श सज़ा था, उसका समर्पण पश्चात्ताप. उसने सिसकियाँ लीं, और मैंने उसे और ज़ोर से पकड़ा. जब मैं उसके अंदर था, मैंने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन मेरे लिए नहीं धड़क रही है. यह केवल प्रतिशोध था. मैंने ख़ुद से बदला लिया, उस प्यार से बदला लिया, जिसने मुझे इतना कमज़ोर बना दिया था.

चौथी रात: इंतकाम की तैयारी

चौथी रात, हम अजनबी थे. कमरे में एक अजीब सी शांति थी-तूफ़ान से पहले की शांति. मैं लिख रहा था, एक नया अध्याय-हत्या का अध्याय. आराध्या बालकनी में बैठी थी, ठंडी हवा में काँप रही थी. मैंने उसे कम्बल देने की कोशिश नहीं की. मुझे ठंड पसंद थी. यह मुझे एहसास कराती थी कि मैं अब भी जीवित हूँ, भले ही मेरा दिल मर चुका हो.

मैंने विक्रम को फ़ोन किया. “कल रात मेरे घर आओ. ज़रूरी बात करनी है.”

विक्रम हाँफ रहा था, शायद घबराया हुआ था. “किस बारे में, रुद्र?”

“आराध्या के बारे में,” मैंने ठंडा जवाब दिया. “हम तीनों को इस नाटक का अंत करना होगा.”

फ़ोन रखने के बाद, मैंने आराध्या को देखा. वह भी मुझे देख रही थी. उसकी आँखें गहरे समुद्र की तरह थीं, जिनमें मुझे डूबना मंज़ूर था. उस रात हमने एक-दूसरे को छुआ नहीं. हमने एक-दूसरे को देखा. प्यार जब हवस में बदल जाता है, तो वह सबसे ख़तरनाक होता है.

मैंने अपनी डेस्क दराज खोली और अपनी पुरानी रिवॉल्वर बाहर निकाली. मैंने उसे साफ़ किया, उसके ठंडे मेटल को महसूस किया. यह किसी और के लिए नहीं थी. यह मेरे लिए थी. मैं जानता था कि इस कहानी में अब सिर्फ़ एक ही निकास है.

पांचवी रात: लहू, झूठ और लीजेंड

अगली रात, विक्रम आया. वह घबराया हुआ था, पर आत्मविश्वासी होने का ढोंग कर रहा था. हमने शराब पी. आराध्या ने खुद तीनों के लिए ग्लास भरे. मैंने देखा कि उसने मेरे ग्लास को एक सेकंड ज़्यादा देर तक पकड़े रखा.

“तो,” विक्रम ने कहा, “क्या हम माफ़ी की बात कर रहे हैं?”

“माफ़ी?” मैंने हँसा. “इश्क़ और जंग में माफ़ी नहीं होती, विक्रम. सिर्फ़ परिणाम होते हैं.”

आराध्या चुपचाप बैठी रही, उसकी आँखें ज़मीन पर टिकी थीं. वह वही सिंदूरी साड़ी पहने थी, जो उसने हमारी पहली रात पहनी थी. एक संकेत. एक चेतावनी. जिसे मैंने अनदेखा कर दिया.

शराब का पहला घूँट मेरे गले से नीचे उतरा. यह सामान्य नहीं था. एक कड़वाहट, जिसके बाद ज़बान सुन्न होने लगी. मैं जानता था. आराध्या ने ज़हर मिलाया था. पर सिर्फ़ मेरे लिए नहीं. उसने अपने लिए भी गिलास में ज़हर मिलाया था. उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी.

“तुम क्या कर रही हो?” मैं हाँफने लगा. मेरे होंठों से शब्द बाहर नहीं आ रहे थे.

विक्रम ने देखा. वह उठने की कोशिश करने लगा, पर ज़हर तेज़ी से काम कर रहा था. वह ज़मीन पर गिर पड़ा, कराहने लगा.

आराध्या ने अपना ग्लास ख़त्म किया. फिर वह मेरे पास आई. उसने मेरे होंठों को छुआ, अपनी उँगलियों से. “तुमने मुझसे कहा था, रुद्र, कि यह जिस्म, यह साँसें, यह दिल… सब तुम्हारा है. मैं इसे किसी और का नहीं होने दूँगी.”

वह ज़हर तेज़ी से मेरी नसों में फैल रहा था. इससे पहले कि मैं पूरी तरह पैरालाइज़्ड हो जाता, मैंने देखा कि आराध्या धीरे से मेरी डेस्क की ओर बढ़ी. उसने मेरी रिवॉल्वर उठाई, और मेरी काँपती उँगलियों में डाल दी.

“लोग मेरी कहानी नहीं पढ़ेंगे, रुद्र,” उसने फुसफुसाया, उसके चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान थी. “वे तुम्हारी कहानी पढ़ेंगे. कहानी एक ऐसे लेखक की, जिसने अपने प्यार की बेवफ़ाई बर्दाश्त नहीं की.”

उसने मेरी आँखें बंद कीं, फिर विक्रम की ओर देखा, जो अब ज़मीन पर निर्जीव पड़ा था. वह वापस आई, और मेरे बिस्तर पर लेट गई, ठीक उसी जगह, जहाँ हमने प्यार की क़समें खाई थीं.

मैंने आख़िरी बार अपनी उँगलियों को हिलाने की कोशिश की, ताकि रिवॉल्वर दूर फेंक सकूँ, पर मैं सिर्फ़ एक मृत शरीर था जो अभी भी साँस ले रहा था. आराध्या ने अपनी सिंदूरी साड़ी का पल्लू ज़ोर से खींचा, और उसे अपने चेहरे पर लपेट लिया.

अंधेरा छाने से पहले, मैंने एक गोली चलने की आवाज़ सुनी. एक नहीं, बल्कि दो. पहली आवाज़, जो मैंने साफ़ सुनी, विक्रम के शरीर को भेदने की थी. और दूसरी… दूसरी आवाज़ मेरे कान के पास आई. पर मैंने नहीं चलाई थी. शायद हवा ने चलाई होगी. या शायद, मेरे भीतर का लेखक, जिसने अपनी नायिका को अमर कर दिया था.

आराध्या ने मरते हुए भी मुझे एक ऐसा इंतकाम दिया, जो मेरे प्रेम से कहीं ज़्यादा बड़ा था. उसने मेरे हाथों में बंदूक दी, ताकि दुनिया यह माने कि मैंने बदला लिया. उसने ख़ुद को मार डाला, ताकि मैं हमेशा जीवित रहूँ, पर एक क़ातिल के रूप में.

अंतिम शब्द

जासूस उठ खड़ा हुआ. उसके चेहरे पर अब भी संशय था. “लेकिन रिवॉल्वर पर तो सिर्फ़ आपके फ़िंगरप्रिंट्स थे, रुद्र जी. और विक्रम और आराध्या के शरीर पर गोलियाँ बहुत क़रीब से मारी गईं थीं.”

मैंने ठंडी साँस ली. उस रात, मैं दो हत्याओं का गवाह बना था. या तीन का? ज़हर से मेरा शरीर लक़वाग्रस्त हो गया था, पर मेरा दिमाग़ काम कर रहा था. मैंने आराध्या को रिवॉल्वर उठाते हुए देखा था, और मैंने ही उसे सिखाया था कि निशाना कैसे लगाते हैं.

“आप जानते हैं, इंस्पेक्टर,” मैंने धीरे से कहा, “प्रेम जब तक समर्पण न हो, वह केवल एक नक़ाब होता है. आराध्या ने प्यार नहीं किया, उसने मुझ पर कब्ज़ा किया था. और जब वह कब्ज़ा टूट रहा था, तो उसने उसे लीजेंड बना दिया.”

मैंने अब पूरी तरह मुस्कुराया. एक दर्दनाक, रहस्यमय मुस्कान. “मैंने उसे नहीं मारा. उसने मुझे मारा. वह मुझे ज़िंदा छोड़कर गई, ताकि मैं हर पल उस इंतकाम को जीऊँ. उस रात, मैं पाँचवीं रात के इंतकाम का सबसे बड़ा शिकार था. मैंने सिर्फ़ अपनी कहानी लिखी थी, और उसने उसे ख़ून से सच कर दिया.”

पाँचवी रात का इंतकाम: लहू और लिबास की दास्तान

बारिश की आवाज़… हमेशा वही. जब भी वह आवाज़ गूँजती है, मुझे उसकी सिंदूरी साड़ी और बेख़ौफ़ आँखों की याद आती है. दरवाज़े पर दस्तक हुई, ‘जासूस’ अंदर आया. उसने मेरी ओर देखा, उसकी नज़रों में सवाल नहीं, सिर्फ़ ज़लालत थी. वह जानता था कि मैं अपराधी हूँ. मैं जानता था कि वह नहीं जानता कि मैं किस अपराध के लिए मर रहा हूँ.

“रुद्र जी,” जासूस ने कहा, उसकी आवाज़ सूखी और रूखी थी, “हमें बस एक और बार उस रात की कहानी सुननी है. आराध्या की लाश आपको कहाँ मिली थी?”

मैंने बंद आँखें खोलीं. यह सवाल नहीं था, यह मेरी आत्मा पर खींची गई पांचवी लकीर थी. पाँच लकीरें, जो पाँच रातें थीं, और हर रात में एक ज़हर घुला हुआ था. मेरी कहानी, मेरी आराध्या, मेरी सबसे खूबसूरत, सबसे ख़तरनाक भूल.

“कमरे में,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ गहरी और स्थिर थी. “बेड पर, जहाँ हमने पहली बार एक-दूसरे को ‘हमेशा’ का वादा दिया था.”

पहली रात: जब रूह से रूह का मिलना हुआ

अगर इश्क़ की कोई परिभाषा होती, तो वह आराध्या थी. पहली बार जब मैंने उसे देखा, वह मेरे लिखे उपन्यास के एक पन्ने की तरह थी-अधूरी, पर असीम रूप से मोहक. हमने जल्दी की, बहुत जल्दी. शादी के बाद हमारी पहली रात शिमला के उसी पुराने कॉटेज में बीती, जहाँ की चीड़ की खुशबू आज भी मेरी साँसों में बसी है.

उस रात, वह सिर्फ़ मेरी थी. उसके जिस्म की हर कशिश, उसकी आँखों की वो ज्वाला, सब मेरे लिए थी. जब उसने अपने ब्लाउज़ की डोर खोली, तो सिर्फ़ एक आवाज़ आई- रेशम के फिसलने की. उसकी त्वचा, चंद्रमा की रोशनी में, दूधिया और उत्तेजक थी. मैंने पहली बार जाना कि वासना केवल शरीर की भूख नहीं होती, यह आत्मा का समर्पण होती है.

“रुद्र,” उसने फुसफुसाया था, जब मेरे होंठ उसकी गर्दन की धड़कन पर रुके थे. उसकी आवाज़ में वो नशा था, जिसे मैंने अपनी कविताओं में कभी बयाँ नहीं किया था. मैंने उसके शरीर पर अपने नाम की मुहर लगाई थी, हर स्पर्श में एक वादा था कि हम कभी नहीं टूटेंगे. जब सूरज निकला, हम थके हुए नहीं थे, बल्कि नए सिरे से जन्मे थे. यह वह ‘रुहानियत’ थी, जिसने मुझे बाद में तबाह कर दिया.

दूसरी रात: जब दरारें दिखने लगीं

इश्क़ जब जुनून बन जाता है, तो वह ख़तरा पैदा करता है. हमारे रिश्ते में दरारें तब आईं, जब मेरा ध्यान मेरे लेखन की ओर ज़्यादा गया. मेरे शब्द उसकी ज़ुल्फ़ों से ज़्यादा ज़रूरी हो गए. आराध्या, जिसे हर पल मेरी ज़रूरत थी, उसने पहली बार किसी और में सांत्वना खोजी.

वह शख़्स, विक्रम. मेरा पब्लिशर, जो हमेशा मेरे क़रीब रहा, और जिसे मेरी आराध्या की ख़ूबसूरती की लत लग गई थी. मुझे शक हुआ, वह अजीब सी चुप्पी, वह देर रात तक फ़ोन पर बात करना. पर मैंने नज़रंदाज़ किया. मैंने ख़ुद से कहा, ‘वह मेरी है. हमेशा मेरी रहेगी.’

एक रात, जब वह स्टूडियो पार्टी से लौटी, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी-असंतोष की. हमने फिर से प्यार किया, पर इस बार वह समर्पण नहीं था. वह बस एक शारीरिक क्रिया थी, जिसके ज़रिए वह मुझे साबित करना चाहती थी कि वह अब भी मेरी है. मैंने उसके जिस्म पर एक अलग इत्र की ख़ुशबू महसूस की. ख़ूबसूरत, पर अजनबी. मैंने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया, इतनी ज़ोर से कि वह कराह उठी.

“क्या हुआ, रुद्र?” उसने पूछा था.

“कुछ नहीं,” मैंने उसके कान में साँस छोड़ी थी, “बस, यह याद दिला रहा हूँ कि यह जिस्म, यह साँसें, यह दिल… सब मेरा है.”

उसकी आँखें नम हो गईं. वह झूठ नहीं बोल रही थी. वह मर रही थी, मेरे और विक्रम के बीच फँसकर. और मैं, मैं अपने शक के अँधेरे में उसे और धकेल रहा था.

तीसरी रात: शक का साया और ज़हर का चुम्बन

जासूस ने अपनी कुर्सी आगे सरकाई. “उस रात क्या हुआ था, जब आप दोनों के बीच आखिरी बार झगड़ा हुआ?”

“झगड़ा नहीं,” मैंने सुधारा, “बातचीत. एक शांत, ज़हरीली बातचीत.”

वह तीसरी रात, मैं पूरी तरह टूट चुका था. मेरे पास सबूत था-एक छोटा सा लॉकेट, जो मैंने विक्रम के कोट में पाया था, जिस पर A और V खुदा था. मैंने लॉकेट अपनी हथेली में भींच लिया था, जिससे मेरी चमड़ी कट गई. उस रात, जब मैं बेडरूम में गया, आराध्या नग्न बैठी थी, बस एक शीयर शॉल ओढ़े. वह जानती थी कि मैं सब जानता हूँ.

“मैं तुम्हें प्यार करती हूँ,” उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी.

“प्यार?” मैं हँसा, एक डरावनी, खोखली हँसी. मैंने उसके चेहरे पर थूक दिया होता, पर मैं उसे छूना चाहता था, उसे नष्ट करना चाहता था.

मैंने उस लॉकेट को ज़मीन पर फेंक दिया. “विक्रम की खुशबू अब भी तुम्हारे बालों में है, आराध्या. क्या उसने भी तुम्हें ऐसे ही छुआ था?”

वह उठ खड़ी हुई. उसकी नग्नता अब मेरे लिए मोहक नहीं, बल्कि अपमानजनक थी. उसने मेरे क़रीब आकर मेरा चेहरा अपने हाथों में ले लिया. उसके होंठ मेरे होंठों से टकराए. वह चुम्बन, प्रेम का नहीं था, वह एक ज़हर का चुम्बन था. उसने मुझे वापस अपने वश में करने की आख़िरी कोशिश की.

हमारे शरीर फिर मिले, एक हिंसक, बेदर्द मिलन. मेरा स्पर्श सज़ा था, उसका समर्पण पश्चात्ताप. उसने सिसकियाँ लीं, और मैंने उसे और ज़ोर से पकड़ा. जब मैं उसके अंदर था, मैंने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन मेरे लिए नहीं धड़क रही है. यह केवल प्रतिशोध था. मैंने ख़ुद से बदला लिया, उस प्यार से बदला लिया, जिसने मुझे इतना कमज़ोर बना दिया था.

चौथी रात: इंतकाम की तैयारी

चौथी रात, हम अजनबी थे. कमरे में एक अजीब सी शांति थी-तूफ़ान से पहले की शांति. मैं लिख रहा था, एक नया अध्याय-हत्या का अध्याय. आराध्या बालकनी में बैठी थी, ठंडी हवा में काँप रही थी. मैंने उसे कम्बल देने की कोशिश नहीं की. मुझे ठंड पसंद थी. यह मुझे एहसास कराती थी कि मैं अब भी जीवित हूँ, भले ही मेरा दिल मर चुका हो.

मैंने विक्रम को फ़ोन किया. “कल रात मेरे घर आओ. ज़रूरी बात करनी है.”

विक्रम हाँफ रहा था, शायद घबराया हुआ था. “किस बारे में, रुद्र?”

“आराध्या के बारे में,” मैंने ठंडा जवाब दिया. “हम तीनों को इस नाटक का अंत करना होगा.”

फ़ोन रखने के बाद, मैंने आराध्या को देखा. वह भी मुझे देख रही थी. उसकी आँखें गहरे समुद्र की तरह थीं, जिनमें मुझे डूबना मंज़ूर था. उस रात हमने एक-दूसरे को छुआ नहीं. हमने एक-दूसरे को देखा. प्यार जब हवस में बदल जाता है, तो वह सबसे ख़तरनाक होता है.

मैंने अपनी डेस्क दराज खोली और अपनी पुरानी रिवॉल्वर बाहर निकाली. मैंने उसे साफ़ किया, उसके ठंडे मेटल को महसूस किया. यह किसी और के लिए नहीं थी. यह मेरे लिए थी. मैं जानता था कि इस कहानी में अब सिर्फ़ एक ही निकास है.

पांचवी रात: लहू, झूठ और लीजेंड

अगली रात, विक्रम आया. वह घबराया हुआ था, पर आत्मविश्वासी होने का ढोंग कर रहा था. हमने शराब पी. आराध्या ने खुद तीनों के लिए ग्लास भरे. मैंने देखा कि उसने मेरे ग्लास को एक सेकंड ज़्यादा देर तक पकड़े रखा.

“तो,” विक्रम ने कहा, “क्या हम माफ़ी की बात कर रहे हैं?”

“माफ़ी?” मैंने हँसा. “इश्क़ और जंग में माफ़ी नहीं होती, विक्रम. सिर्फ़ परिणाम होते हैं.”

आराध्या चुपचाप बैठी रही, उसकी आँखें ज़मीन पर टिकी थीं. वह वही सिंदूरी साड़ी पहने थी, जो उसने हमारी पहली रात पहनी थी. एक संकेत. एक चेतावनी. जिसे मैंने अनदेखा कर दिया.

शराब का पहला घूँट मेरे गले से नीचे उतरा. यह सामान्य नहीं था. एक कड़वाहट, जिसके बाद ज़बान सुन्न होने लगी. मैं जानता था. आराध्या ने ज़हर मिलाया था. पर सिर्फ़ मेरे लिए नहीं. उसने अपने लिए भी गिलास में ज़हर मिलाया था. उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी.

“तुम क्या कर रही हो?” मैं हाँफने लगा. मेरे होंठों से शब्द बाहर नहीं आ रहे थे.

विक्रम ने देखा. वह उठने की कोशिश करने लगा, पर ज़हर तेज़ी से काम कर रहा था. वह ज़मीन पर गिर पड़ा, कराहने लगा.

आराध्या ने अपना ग्लास ख़त्म किया. फिर वह मेरे पास आई. उसने मेरे होंठों को छुआ, अपनी उँगलियों से. “तुमने मुझसे कहा था, रुद्र, कि यह जिस्म, यह साँसें, यह दिल… सब तुम्हारा है. मैं इसे किसी और का नहीं होने दूँगी.”

वह ज़हर तेज़ी से मेरी नसों में फैल रहा था. इससे पहले कि मैं पूरी तरह पैरालाइज़्ड हो जाता, मैंने देखा कि आराध्या धीरे से मेरी डेस्क की ओर बढ़ी. उसने मेरी रिवॉल्वर उठाई, और मेरी काँपती उँगलियों में डाल दी.

“लोग मेरी कहानी नहीं पढ़ेंगे, रुद्र,” उसने फुसफुसाया, उसके चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान थी. “वे तुम्हारी कहानी पढ़ेंगे. कहानी एक ऐसे लेखक की, जिसने अपने प्यार की बेवफ़ाई बर्दाश्त नहीं की.”

उसने मेरी आँखें बंद कीं, फिर विक्रम की ओर देखा, जो अब ज़मीन पर निर्जीव पड़ा था. वह वापस आई, और मेरे बिस्तर पर लेट गई, ठीक उसी जगह, जहाँ हमने प्यार की क़समें खाई थीं.

मैंने आख़िरी बार अपनी उँगलियों को हिलाने की कोशिश की, ताकि रिवॉल्वर दूर फेंक सकूँ, पर मैं सिर्फ़ एक मृत शरीर था जो अभी भी साँस ले रहा था. आराध्या ने अपनी सिंदूरी साड़ी का पल्लू ज़ोर से खींचा, और उसे अपने चेहरे पर लपेट लिया.

अंधेरा छाने से पहले, मैंने एक गोली चलने की आवाज़ सुनी. एक नहीं, बल्कि दो. पहली आवाज़, जो मैंने साफ़ सुनी, विक्रम के शरीर को भेदने की थी. और दूसरी… दूसरी आवाज़ मेरे कान के पास आई. पर मैंने नहीं चलाई थी. शायद हवा ने चलाई होगी. या शायद, मेरे भीतर का लेखक, जिसने अपनी नायिका को अमर कर दिया था.

आराध्या ने मरते हुए भी मुझे एक ऐसा इंतकाम दिया, जो मेरे प्रेम से कहीं ज़्यादा बड़ा था. उसने मेरे हाथों में बंदूक दी, ताकि दुनिया यह माने कि मैंने बदला लिया. उसने ख़ुद को मार डाला, ताकि मैं हमेशा जीवित रहूँ, पर एक क़ातिल के रूप में.

अंतिम शब्द

जासूस उठ खड़ा हुआ. उसके चेहरे पर अब भी संशय था. “लेकिन रिवॉल्वर पर तो सिर्फ़ आपके फ़िंगरप्रिंट्स थे, रुद्र जी. और विक्रम और आराध्या के शरीर पर गोलियाँ बहुत क़रीब से मारी गईं थीं.”

मैंने ठंडी साँस ली. उस रात, मैं दो हत्याओं का गवाह बना था. या तीन का? ज़हर से मेरा शरीर लक़वाग्रस्त हो गया था, पर मेरा दिमाग़ काम कर रहा था. मैंने आराध्या को रिवॉल्वर उठाते हुए देखा था, और मैंने ही उसे सिखाया था कि निशाना कैसे लगाते हैं.

“आप जानते हैं, इंस्पेक्टर,” मैंने धीरे से कहा, “प्रेम जब तक समर्पण न हो, वह केवल एक नक़ाब होता है. आराध्या ने प्यार नहीं किया, उसने मुझ पर कब्ज़ा किया था. और जब वह कब्ज़ा टूट रहा था, तो उसने उसे लीजेंड बना दिया.”

मैंने अब पूरी तरह मुस्कुराया. एक दर्दनाक, रहस्यमय मुस्कान. “मैंने उसे नहीं मारा. उसने मुझे मारा. वह मुझे ज़िंदा छोड़कर गई, ताकि मैं हर पल उस इंतकाम को जीऊँ. उस रात, मैं पाँचवीं रात के इंतकाम का सबसे बड़ा शिकार था. मैंने सिर्फ़ अपनी कहानी लिखी थी, और उसने उसे ख़ून से सच कर दिया.”

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